

Rashtra Sevika Samiti History: भारतवर्ष एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चैतन्यमय राष्ट्र के रूप में विश्वभर में विख्यात है। देश के विशाल ऐतिहासिक पटल पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के समान ही महत्वपूर्ण रही है। भारतीय संस्कृति ने स्त्री को केवल पारिवारिक दायरे तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसे सृजन, संस्कार, शक्ति और परिवर्तन का प्रमुख केंद्र माना है।
इसी व्यापक चिंतन से लगभग नौ दशक पूर्व एक विलक्षण संगठनात्मक कार्य का प्रारंभ हुआ। वर्धा की भूमि पर विजयादशमी के शुभ दिन, 25 अक्टूबर 1936 को लक्ष्मीबाई केलकर, जिन्हें मौसी जी के नाम से भी जाना जाता है, ने ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की स्थापना की। यह आधुनिक काल में भारतीय स्त्रीशक्ति के संगठित जागरण का प्रारंभ-बिंदु था।
परतंत्रता के काल में भारत की अस्मिता को आघात पहुंचा था और सामाजिक तथा राष्ट्रीय परिस्थितियां अत्यंत अस्थिर थीं। मौसी जी के मन में बचपन से ही इस परिस्थिति को लेकर बेचैनी थी। राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है; समाज की अंतःशक्ति को जागृत करना भी उतना ही आवश्यक है, यह विचार उनके मन में दृढ़ होता गया।
स्त्री राष्ट्र की आधारशिला है, इस विश्वास से सन 1936 की विजयादशमी को राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना हुई। ‘सम् इति समितिः’ समान ध्येय, समान प्रेरणा और राष्ट्रनिष्ठा से स्वयंस्फूर्त रूप से एकत्रित हुई महिलाओं की संगठित शक्ति अर्थात राष्ट्र सेविका समिति।
श्री. भास्करराव दाते और यशोदाबाई दाते के घर 6 जुलाई 1905 को नागपुर में ‘कमल’ का जन्म हुआ। घर के निर्भीक वातावरण के कारण कमल पर बाल्यावस्था में ही देशभक्ति के गहरे संस्कार हुए। 1915 में कमल का विवाह वर्धा के पुरुषोत्तमराव केलकर से हुआ और वे ‘लक्ष्मीबाई’ के नाम से जानी जाने लगीं। 1932 में पति के अकाल निधन के बाद लक्ष्मीबाई पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा; फिर भी उन्होंने आत्मचिंतन और समाजकार्य जारी रखा।
वे महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं में जाती थीं। एक सभा में स्त्रियों को किसका आदर्श रखना चाहिए, यह प्रश्न आया तो गांधीजी ने सीतामाता का आदर्श रखने को कहा, क्योंकि सीता के तेज, तप और पवित्रता के कारण ही राम श्रीराम बने।
रामायण का अध्ययन करने के बाद लक्ष्मीबाई के ध्यान में आया कि स्त्री को अपने सामर्थ्य से अपनी रक्षा करना सीखना चाहिए। राष्ट्र के उत्थान के लिए स्त्री और पुरुष दोनों का समान सशक्तिकरण आवश्यक है, यह विचार उनके मन में दृढ़ हो गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार वर्धा आए थे। शाखा में अभिभावकों के लिए आयोजित सत्र में लक्ष्मीबाई ने बौद्धिक सत्र समाप्त होने के बाद उनसे भेंट कर पुरुषों के समान महिलाओं के संगठन की आवश्यकता प्रस्तुत की।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने उन्हें बताया कि महिलाओं के संगठन कार्य की जिम्मेदारी उन्हें स्वतंत्र रूप से संभालनी चाहिए, संघ उन्हें पूर्ण सहयोग करेगा। रेल की दो समानांतर पटरियों की भांती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और महिलाओं का संगठन एक ही ध्येय से कार्य करेंगे। इसी के बाद 1936 में ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की स्थापना हुई।
मौसी जी यानी लक्ष्मीबाई केलकर के नेतृत्व में शाखा-विस्तार, सम्मेलन, सेवाकार्य, रामायण प्रवचनों के माध्यम से समाजजागरण जैसे विभिन्न स्तरों पर विभिन्न आयामों में समिति कार्य का प्रकाश चारों ओर फैलने लगा और निष्ठावान विस्तारिकाओं और प्रचारिकाओं की एक सशक्त पंक्ति खड़ी हुई।
27 नवंबर 1978 को लक्ष्मीबाई केलकर के निधन के बाद पुणे की सरस्वती ताई आपटे सन 1978 से 1994 तक समिति की प्रमुख संचालिका रहीं। इसके बाद उषाताई चाटी और प्रमिलाताई मेढे ने राष्ट्र सेविका समिति का नेतृत्व किया। वर्तमान में शांताक्काजी समिति की प्रमुख संचालिका हैं।
व्यक्ति गुण-दोषों से युक्त हो सकता है; इसलिए व्यक्तिनिष्ठा की अपेक्षा तत्त्वनिष्ठा को प्राथमिकता देते हुए राष्ट्र सेविका समिति ने धर्म, संस्कृति, त्याग, शौर्य तथा राष्ट्र की ऐतिहासिक उदात्तता और वैभवशाली परंपरा का प्रतीक भगवा ध्वज को गुरुस्थान पर स्वीकार किया है।
राष्ट्र सेविका समिति के कार्य की मुख्य इकाई शाखा है। योग, सूर्यनमस्कार, दंड, यष्टि, खेल, देशभक्ति गीत, बौद्धिक चर्चा, वर्तमान घटनाओं पर विचार-मंथन और संस्कारपूरक कार्यक्रमों के माध्यम से सेविका के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता जाता है।
आज देशभर में राष्ट्र सेविका समिति की 4886 से अधिक सक्रिय शाखाएं हैं, जिनमें लगभग 591 दैनिक शाखाएं हैं। व्यावसायिक महिलाओं और युवतियों के लिए 1173 से अधिक मिलन आयोजित होते हैं।
राष्ट्र सेविका समिति एक वर्ष की नन्ही बालिका से लेकर लकड़ी के सहारे शाखा में आने वाली 90 वर्ष की दादी तक सभी के लिए खुली है। प्रत्येक की आयु, क्षमता और रुचि के अनुसार समिति में कार्य का अवसर उपलब्ध है। शाखा से शारीरिक सामर्थ्य के साथ-साथ मानसिक दृढ़ता, सामाजिक संवेदनशीलता, नेतृत्वगुण, निर्णयक्षमता, समूहभावना और राष्ट्रनिष्ठा विकसित होती है। अनुशासन, समयपालन, स्वावलंबन, सहयोग और संवादकौशल के संस्कार अनायास ही व्यक्तित्व में उतरते है।
राष्ट्र सेविका समिति लगभग 2866 सेवा प्रकल्प चला रही है। स्वावलंबन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और संस्कार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सेवाकार्य का विस्तार हुआ है। महिलाओं के कौशल विकास के लिए साठ से अधिक केंद्रों में सिलाई, हस्तकला, कंप्यूटर प्रशिक्षण, खाद्य प्रसंस्करण और विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए जाते हैं।
स्व-सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण और नागरी क्षेत्रों की महिलाओं को महानगरों के बाजार से जोड़ा जाता है। दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए निःशुल्क चिकित्सालय और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं। नेत्र जांच, महिला स्वास्थ्य, मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता, मातृ स्वास्थ्य और पोषण जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
बाढ़, भूकंप, चक्रवात और महामारी जैसी संकटपूर्ण परिस्थितियों में समिति की सेविकाएं राहत कार्यों में सक्रिय रूप से सहभागी रही हैं। तमिलनाडु में सुनामी प्रभावित परिवारों की बच्चियों के लिए छात्रावास प्रारंभ करना, गुजरात में भूकंप के बाद मयापुर गांव का पुनर्वास करना तथा कोरोना काल में मास्क, धान्य, सैनिटरी सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं का बड़े पैमाने पर वितरण करना, संक्रमित लोगों की सेवा करना और अंत्येष्टि तक की जिम्मेदारी निभाना, हाल ही में नेपाल के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में सहायता पहुंचाना, ये सभी समिति की ‘नरसेवा ही नारायण सेवा’ की सेवाभावी वृत्ति के प्रेरक उदाहरण हैं।
राष्ट्रनिर्माण केवल आर्थिक समृद्धि या राजनीतिक स्थिरता नहीं है। राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति में होती है। समिति के विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सांस्कृतिक उत्सव, कथाकथन, पारंपरिक कलाएं, परिवार प्रबोधन, भारतीय परंपरा और जीवनमूल्यों से संबंधित उपक्रमों के माध्यम से सांस्कृतिक अस्मिता जागृत की जाती है।
इसके साथ ही पर्यावरण जागरूकता, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, गोशाला और जैविक खेती जैसे उपक्रमों के माध्यम से प्रत्यक्ष कृती द्वारा पर्यावरण जागरूकता उत्पन्न की जाती है।
जो बालिकायें शिक्षा से वंचित हैं, हिंसा या आतंकवाद से प्रभावित हैं अथवा किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों से हैं, ऐसी बालिकाओं के लिए समिति छात्रावास चलाती है। लगभग 27 निवासी निःशुल्क और 9 सशुल्क छात्रावासों के माध्यम से, विशेषतः दूरस्थ, जनजातीय और उत्तर-पूर्व क्षेत्रों से आने वाली बालिकाओं को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा, पौष्टिक भोजन, पुस्तकालय, कंप्यूटर प्रयोगशाला तथा योग, मार्शल आर्ट्स जैसे जीवन-कौशल का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वे अपने पैरों पर खड़ी होने तक या फिर विवाह कर जीवन को स्थिरता प्राप्त होने तक समिति उनका साथ देती है।
भारतीय समाज पूरे विश्व में फैला हुआ है। विदेशों में पली-बढ़ी दूसरी-तीसरी पीढ़ी के सामने संस्कृति और आधुनिक जीवनशैली के बीच संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। भारत के बाहर कुछ देशों में समिति की सेविकाएं हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) के साथ कार्यरत हैं। बालगोकुलम, यूथ प्रोग्रामिंग, रक्तदान, अन्नदान, आपदा सहायता और स्थानीय समुदाय सेवा जैसे उपक्रमों के माध्यम से अगली पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने का कार्य सेविकाएं कर रही हैं।
समय बदला, तकनीक बदली और समाज की चुनौतियां बदलीं। मौसीजी लक्ष्मीबाई केलकर ने जो ज्योति प्रज्वलित की थी, वह आज अनेक पीढ़ियों की सेविकाओं के कार्य से प्रज्वलित है। आज समिति पंच परिवर्तन, महिला सुरक्षा, सांस्कृतिक अस्मिता, डिजिटल माध्यमों का प्रभाव और युवा पीढ़ी के सामने उपस्थित मानसिक एवं सामाजिक चुनौतियों जैसे अनेक विषयों पर नए दृष्टिकोण से कार्य कर रही है।
राष्ट्र सेविका समिति की यात्रा को केवल संगठन के विस्तार के इतिहास के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह स्त्रीशक्ति के अखंड जागरण, व्यक्तिनिर्माण, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रनिर्माण के दीर्घ प्रयासों की यात्रा है।
लक्ष्मीबाई केलकर द्वारा लगाया गया पौधा आज विशाल वटवृक्ष बन गया है। उसकी छाया में अनेक पीढ़ियों को राष्ट्रकार्य की प्रेरणा मिल रही है।यदि स्त्रीशक्ति जागृत हो, संस्कृति से जुड़ी हुई हो और उसके सामर्थ्य को राष्ट्रसेवा की दिशा प्राप्त हो, तो राष्ट्र का पुनरुत्थान निश्चित रूप से संभव है।
लेख- प्रा. आरती तिवारी, विदर्भ प्रांत बौद्धिक प्रमुख, राष्ट्र सेविका समिति के द्वारा