नागपुर में स्वच्छता के नाम पर बड़ा खेल! कम्युनिटी टॉयलेट्स पर हर महीने 66 लाख का खर्च, फिर भी बजबजा रहे शौचालय

Nagpur Public Toilets: नागपुर में सार्वजनिक शौचालयों की सफाई पर हर महीने करीब 66 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद कई स्थानों पर स्वच्छता और रखरखाव की स्थिति संतोषजनक नहीं दिख रही है।
Major racket in the name of cleanliness in Nagpur! ₹66 lakh spent monthly on community toilets, yet they remain filthy and reeking.
नागपुर, सार्वजनिक शौचालय, स्वच्छता, (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur Public Toilets Sanitation: नागपुर सिटी में सार्वजनिक शौचालयों की सफाई पर हर महीने लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण और स्वच्छ सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। स्वच्छता के नाम पर इतना पैसा खर्च करने के बावजूद, कई जगहों पर शौचालयों की हालत दयनीय है, जिससे इस खर्च की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

जानकारी के अनुसार शहर में कम्युनिटी टॉयलेट्स में कुल 2,200 सीटें हैं। नियमों के अनुसार, प्रत्येक शौचालय को दिन में 3 बार साफ करना अनिवार्य है और शिफ्ट के अनुसार हर 8 घंटे में सफाई करना आवश्यक है। इसके लिए ब्लीचिंग पाउडर, फिनाइल, हार्षिक और टार की गोलियों जैसे सफाई पदार्थों का उपयोग करना जरूरी है।

सार्वजनिक शौचालयों पर लाखों खर्च, स्वच्छता और गुणवत्ता पर उठे सवाल

सूत्रों के अनुसार शौचालयों की सफाई का काम एक निजी कंपनी को दिया गया है। प्रत्येक सीट के लिए 100 रुपये का भुगतान किया जाता है। अर्थात 2,200 सीटों की सफाई का खर्च लगभग 2,20,000 रुपये प्रतिदिन है। यदि एक महीने के खर्च की बात करें तो यह खर्च करीब 66 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। शौचालयों की हालत देखकर यह स्पष्ट नहीं होता कि नियमों के अनुसार उनकी दिन में 3 बार सफाई की जा रही है। लाखों खर्च के साथ, यह उम्मीद की जाती है कि नागरिकों को मॉल या हवाई अड्डों जैसी स्वच्छ और गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराई।

स्मार्ट टॉयलेट के हाल भी बदतर

शहर में करीब 20 करोड़ रुपये की लागत से बने स्मार्ट टॉयलेट की स्वच्छता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इन शौचालयों के रखरखाव और सफाई का खर्च भी मनपा करती है। हालांकि यहां भी कम्युनिटी शौचालयों के समान स्वच्छता मानक लागू है। लेकिन इनके वास्तविक कार्यान्वयन पर संदेह जताया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, स्मार्ट शौचालयों का रखरखाव भी एक निजी कंपनी द्वारा किया जाता है। इस पर प्रति माह 65 से 75 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं। पिछले 10 वर्षों में स्मार्ट शौचालयों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद, नागरिकों को अपेक्षित गुणवत्ता वाली सुविधाएं नहीं मिल रही है। इसलिए, सार्वजनिक धन के उपयोग और स्वच्छता व्यवस्था की कार्यकुशलता की गहन जांच की मांग उठ रही है।

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