Nagpur News: चुनाव पर फिर लग सकता है ग्रहण, 50 फीसदी से ऊपर गया आरक्षण

OBC quota Maharashtra: निकाय चुनाव में आरक्षण 50% सीमा पार पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के बाद संकट गहराया। नागपुर जेडपी सहित कई निकायों में आरक्षण गलत तय होने की आशंका है।
चुनाव पर फिर लग सकता है ग्रहण
चुनाव पर फिर लग सकता है ग्रहण (सौजन्यः सोशल मीडिया)
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Nagpur ZP Reservation issue: निकाय चुनाव में विभिन्न वर्गों के लिए सीट आरक्षण 50 फीसदी से अधिक किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिए। यह सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है। दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि यदि आरक्षण सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर गई, तो निकाय चुनाव रद्द भी किए जा सकते हैं। इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि चल रही चुनावी प्रक्रिया पर ग्रहण लग सकता है, क्योंकि एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों का कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया है।

कहा जा रहा है कि राज्य चुनाव आयोग ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की व्याख्या करते समय पुराने फ़ॉर्मूले का उपयोग किया। इस प्रक्रिया में आयोग ने 50% सीमा को नज़रअंदाज़ कर सीटों का निर्धारण किया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का गलत अर्थ निकालने के कारण अब पूरा चुनाव संकट में पड़ सकता है।

नागपुर जेडपी में आरक्षण सीमा पार

नागपुर जिला परिषद में 57 सीटों के लिए चुनाव होना है।

  • एससी : 10 सीटें
  • एसटी : 8 सीटें
  • ओबीसी : 15 सीटें
  • ओपन : 24 सीटें

आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की गलत व्याख्या

57 सीटों का 50% = 28.5, यानी अधिकतम 28 सीटें आरक्षित होनी चाहिए थीं। लेकिन यहां 33 सीटें आरक्षण में दी गई हैं,जो सीमा से 5 सीटें अधिक है। इसी तरह की स्थिति राज्यभर की नगर परिषदों, नगर पंचायतों, जिला परिषदों और मनपाओं में भी देखने को मिल रही है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया, तो चुनाव रद्द होने की आशंका बढ़ सकती है।

ओबीसी सीटें कम करना ही विकल्प

यदि आरक्षण को 50% के भीतर रखना है, तो केवल ओबीसी वर्ग की सीटें कम करनी होंगी। एससी और एसटी की सीटों को छुआ नहीं जा सकता। ओबीसी की कुछ सीटों को कम कर उन्हें ओपन श्रेणी में शामिल किया जा सकता है। ओपन वर्ग की सीटें लॉटरी पद्धति से निर्धारित की जा सकती हैं। ऐसा किया जाए तो पूरे आरक्षण को पुनः लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और समय भी बचेगा। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरी तरह स्पष्ट था, तो आयोग ने पहले ही आवश्यक संशोधन क्यों नहीं किए? क्या चुनाव को टालने की कोई मंशा थी?

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