बीच चौराहे पर बस खड़ी कर रहे ड्राइवर; छत्रपति चौक और मानकापुर में ट्रैफिक से जनता परेशान, पुलिस बनी मूकदर्शक

Nagpur Traffic Police: नागपुर ट्रैफिक पुलिस की अधिसूचना फेल! निजी बसों का सड़कों पर कब्जा, वर्धा और अमरावती रोड पर भारी जाम। कागजों पर नियम, सड़कों पर बस चालकों की मनमानी।
Nagpur Traffic Police extends notification for private bus stops by a year, but ground reality remains chaotic. Citizens face massive jams on Wardha Road.
छत्रपति चौक पर ट्रैवल्स की मनमानी (सौजन्य-नवभारत)
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Chhatrapati Square Bus Stop: गर्त में समा चुकी सिटी की ट्रैफिक व्यवस्था के जख्म को ट्रैफिक पुलिस ने प्राइवेट और ट्रैवल्स बसों को शहर के भीतर स्टॉपेज की अधिसूचना को एक वर्ष के लिए बढ़ाकर एक बार फिर कुरेद दिया है। हैरानी की बात यह है कि पिछले वर्ष के लगभग अंतिम महीने तक जारी इस अधिसूचना के बाद भी हालात आज भी जस के तस बने हुए हैं।

फर्क सिर्फ इतना है कि तारीख बदल गई लेकिन व्यवस्था नहीं। सवाल ये है कि आखिर इस आदेश के बाद बदलाव क्या दिखा जो इसे दोबारा लागू कर कर दिया गया। वह भी सीधे एक वर्ष के लिए। नये आदेश में बसों के लिए तय स्टॉप और समय निर्धारित किए गए हैं, ताकि शहर में ट्रैफिक सुचारु रहे लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है।

वर्धा रोड, अमरावती रोड, मानकापुर, छत्रपति चौक जैसे प्रमुख मार्गों पर बसें आज भी मनमाने तरीके से रुकती दिखती हैं। ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी के बावजूद नियमों का पालन नहीं हो रहा जिससे साफ है कि सख्ती सिर्फ कागजों तक सीमित है।

सड़कों पर ट्रैवल्स बस संचालकों का ‘राज’

  • स्थिति इतनी बेकाबू हो चुकी है कि ट्रैवल्स बस संचालकों का व्यवहार ऐसा प्रतीत होता है मानो शहर की सड़कों पर उनका ही मालिकाना हक हो।
  • ड्राइवरों और कंडक्टरों को जैसे अलिखित आदेश दिया गया हो कि जहां मन करे वहां बस रोक देना। फिर चाहे चौक ही क्यों न हो।
  • ड्राइवर भी अपने मालिक की बात को शब्दश: स्वीकार सड़क को जाम कर ट्रैफिक की हत्या करने में कसर नहीं छोड़ते।
  • जहां मन किया वहां बस रोक दी, बीच सड़क पर सवारियां उतार दीं और ट्रैफिक जाम की परवाह किए बिना आगे बढ़ गए।
  • नियम-कायदों की खुलेआम अनदेखी अब आम बात हो गई है। ऐसा लगता है जैसे सड़कों के साथ पूरा ट्रैफिक विभाग ही खरीद लिया गया हो।

ट्रैफिक पुलिस की चुप्पी सवालों में

सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस पूरी अव्यवस्था के बीच ट्रैफिक पुलिस की भूमिका बेहद कमजोर नजर आती है। चौराहों पर तैनाती के बावजूद न तो सख्त कार्रवाई होती है और न ही नियमों का प्रभावी पालन कराया जाता है। कभी-कभार चालान काटकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है लेकिन इससे हालात में कोई सुधार नहीं आता।

वहीं आरटीओ और ट्रैफिक पुलिस के बीच समन्वय की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है। दोनों विभाग अपनी-अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर आते हैं। नतीजा यह है कि न तो बस संचालकों पर नियंत्रण हो पा रहा है और न ही शहरवासियों को राहत मिल रही है।

आम नागरिक सबसे ज्यादा परेशान

इस अव्यवस्था का सबसे ज्यादा खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। ऑफिस जाने वाले कर्मचारी घंटों जाम में फंसते हैं, विद्यार्थियों की बसें लेट होती हैं और एम्बुलेंस जैसी आपात सेवाएं भी प्रभावित होती हैं। शहर की यातायात व्यवस्था धीरे-धीरे अव्यवस्था का पर्याय बनती जा रही है। स्पष्ट है कि केवल अधिसूचना जारी करना समाधान नहीं है। जब तक नियमों को सख्ती से लागू नहीं किया जाएगा और जिम्मेदार विभाग जवाबदेही नहीं निभाएंगे तब तक ऐसे आदेश सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेंगे।

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