नागपुर में तान्हा पोला पर सजा बाजार, लकड़ी के बैलों की बिक्री और पुराने नंदी की डेंटिंग-पेंटिंग से मिला रोजगार

Nagpur Tanha Pola Festival: नागपुर में तान्हा पोला के लीये बाज़ार में बिक रहे लकड़ी के बैलों की मरम्मत और बिक्री से जहां बच्चों में पारंपरिक उत्साह है, वहीं स्थानीय कारीगरों को भी रोज़गार मिल रहा है।
Nagpur Tanha Pola Tradition and Employment
नागपुर में तान्हा पोला त्योहार की धूम(सोर्स: एआई फोटो)
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Nagpur Tanha Pola Tradition And Employment⁠: विदर्भ की सांस्कृतिक राजधानी नागपुर में इन दिनों त्योहारों का एक अलग ही उत्साह देखने को मिल रहा है। 'पोला' का त्योहार जहां किसानों और उनके बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है, वहीं इसके ठीक अगले दिन मनाया जाने वाला तान्हा पोला' बच्चों के लिए खुशियों की सौगात लेकर आता है।

यह एक ऐसी अनूठी परंपरा है जिसमें बच्चे लकड़ी के बैलों को सजाकर उत्सव मनाते हैं, जिससे उनमें बचपन से ही खेती और पशुधन के प्रति सम्मान की भावना जागती है।

बाज़ारों में लकड़ी के बैलों की रौनक

नागपुर के गली-कूचों और प्रमुख चौक-चौराहों पर तान्हा पोला का खुमार अभी से सर चढ़कर बोल रहा है। सड़कों के किनारे सजी अस्थाई दुकानों में लकड़ी के सुंदर और आकर्षक बैल ग्राहकों को लुभा रहे हैं। ये लकड़ी के बैल विभिन्न आकारों में उपलब्ध हैं, जो पहियों वाले ऊंचे लकड़ी के स्टैंड पर विराजमान हैं। कुछ बैल साधारण लकड़ी के रंग में हैं, तो कुछ को गहरे भूरे और लाल रंगों से रंगा गया है। इन बैलों को आकर्षक बनाने के लिए उन पर सुंदर 'झूल' (सजावटी कपड़ा) और नक्काशी भी की गई है ।

मरम्मत और डेंटिंग-पेंटिंग का दौर

बाज़ार में सिर्फ नए बैलों की बिक्री ही नहीं हो रही, बल्कि पुराने बैलों के कायाकल्प का काम भी जोरों पर है। कई लोग अपने पुराने लकड़ी के बैलों को लेकर कारीगरों के पास पहुंच रहे हैं। कहीं बैलों के पहिए बदले जा रहे हैं, तो कहीं उनके टूटे हुए सींगों की मरम्मत हो रही है। लोग अपने बैलों को नया रूप देने के लिए उनकी डेंटिंग-पेंटिंग करवा रहे हैं, जिससे पुराने बैल भी बिल्कुल नए जैसे चमकने लगे हैं।

Nagpur Tanha Pola Tradition and Employment
बैलों की घंटियां, मिट्टी के नंदी और बचपन की यादें, गोंदिया में आज भी जिंदा है पोला की वही यादें

बच्चों में कृतज्ञता और पारंपरिक उत्साह

तान्हा पोला का मुख्य उद्देश्य बच्चों को अपनी संस्कृति और किसान के सबसे बड़े साथी 'बैल' के महत्व से परिचित कराना है। इस दिन बच्चे पारंपरिक वेशभूषा, जैसे धोती-कुर्ता और टोपी पहनकर तैयार होते हैं। वे अपने सजाए हुए लकड़ी के बैलों को लेकर पास के 'पोला मैदान' या चौराहों पर जाते हैं। यह दृश्य न केवल मनमोहक होता है, बल्कि यह नई पीढ़ी में पशुओं के प्रति प्रेम और कृतज्ञता की भावना को भी पुख्ता करता है।

आम लोगों के लिए रोज़गार का जरिया

पोला त्यौहार केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए आर्थिक मदद का जरिया भी बनता है। सड़क किनारे छोटी दुकानें लगाने वाले लोग, पेंटर और बढ़ई इन दिनों काफी व्यस्त हैं। लकड़ी के बैलों को रंगना, उनकी पॉलिश करना और पहिए फिट करने जैसे छोटे-छोटे कामों के जरिए कई सामान्य लोग इस सीजन में अच्छी कमाई कर लेते हैं। दुकानों के पीछे लगे रंग-बिरंगे तोरण और झंडे बाज़ार की रौनक को और बढ़ा रहे हैं।

कुल मिलाकर, नागपुर के बाज़ारों में फैला यह उत्साह इस बात का प्रतीक है कि आधुनिकता के दौर में भी यहां की परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं।

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