नागपुर में सार्वजनिक शौचालयों की बदहाली पर हाईकोर्ट सख्त: मनपा से मांगा जवाब, सफाई व्यवस्था पर उठे सवाल

Nagpur Public Toilets Issue: नागपुर में सार्वजनिक शौचालयों की बदहाल स्थिति पर हाईकोर्ट सख्त। मनपा को फटकार लगाते हुए उपायुक्त से हलफनामा मांगा, सफाई व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे।
High Court Takes Strict Stance on Dilapidated Public Toilets in Nagpur: Seeks Response from Municipal Corporation; Questions Raised Over Sanitation System
नागपुर सार्वजनिक शौचालय गंदगी( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Nagpur Sanitation Infrastructure : नागपुर महानगर पालिका के घनकचरा प्रबंधन और उद्यान विभाग के अंतर्गत आने वाले सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति बेहद दयनीय और गंदी है। शहर के कई विकसित इलाकों में आज भी बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं का भारी अभाव है।

इन तमाम समस्याओं को लेकर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। याचिका पर सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस और न्यायाधीश अनिल किलोर ने मनपा उपायुक्त से हलफनामा प्रस्तुत करने के आदेश दिए।

हाई कोर्ट ने शहर में सार्वजनिक शौचालयों और मूत्रालयों की साफ-सफाई के मुद्दे पर नागपुर महानगर पालिका को कड़ी फटकार लगाई, कोर्ट ने शौचालयों की दिन में केवल तीन बार सफाई को अपर्याप्त बताते हुए उपायुक्त से जवाब तलब किया है।

अबतक 709 टॉयलेट बने

सुनवाई के दौरान महानगर पालिका, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन विभाग और उद्यान विभाग की ओर से पेश हुए वकील ए।एस। मेहाड़िया ने अदालत को जानकारी दी कि शहर में अब तक कुल 709 टॉयलेट सीट और 491 मूत्रालय बनाए गए हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि इन सभी शौचालयों की दिन में तीन बार सफाई की जाती है। मनपा के इस जवाब पर अदालत ने गहरी नाराजगी जताई। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नागपुर शहर की बड़ी आबादी और प्रतिदिन शहर में सफर करने वाले लोगों की भारी संख्या को देखते हुए दिन में केवल तीन बार सफाई करना किसी भी लिहाज से पर्याप्त नहीं है।

बिना सोचे-समझे लिया फैसला

अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि महानगर पालिका के उपायुक्त द्वारा लिया गया यह निर्णय बिना सोचे-समझे लिया गया प्रतीत होता है और उन्हें शहर की जमीनी हकीकत का अंदाजा नहीं है।

अदालत ने इस मामले को गंभीरत्ता से लेते हुए नागपुर महानगर पालिका के उपायुक्त को एक व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने का कड़ा निर्देश दिया। उपायुक्त को अदालत को वह डेटा और कारण बताने होंगे जिसके आधार पर उन्होंने यह तय किया कि सार्वजनिक शौचालयों और मूत्रालयों की सफाई दिन में सिर्फ तीन बार की जानी चाहिए।

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