स्टे देकर मामला लटकाने पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, ग्राम विकास मंत्री को 3 हफ्ते की मोहलत, जानें पूरा मामला
Nagpur News: नागपुर में बर्खास्त अधिकारियों को स्टे देकर एक साल से पद पर बनाए रखने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए ग्राम विकास मंत्री को 3 हफ्ते में फैसला लेने का आदेश दिया।
- Written By: आकाश मसने
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ (फाइल फोटो)
Nagpur High Court Strict On Rural Development Minister: बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने महाराष्ट्र के ग्राम विकास मंत्री की कार्यप्रणाली और वैधानिक अपीलों के निपटारे में हो रही अत्यधिक देरी पर कड़ा ऐतराज जताया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में निर्देश दिया है कि एक वर्ष से अधिक समय से लंबित पड़े एक मामले में मंत्री अगले तीन सप्ताह के भीतर अपना अंतिम फैसला सुनाएं। यह मामला ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों की बर्खास्तगी और उस पर दिए गए अंतरिम स्टे से जुड़ा हुआ है।
क्या है पूरा विवाद?
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता कंचन मेश्राम ने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम की धारा 39(1) के तहत दो व्यक्तियों के खिलाफ गंभीर शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत पर संज्ञान लेते हुए विभागीय आयुक्त ने एक विस्तृत जांच का आदेश दिया। जांच रिपोर्ट में आरोप सिद्ध होने पर विभागीय आयुक्त ने 21 अप्रैल 2025 को दोनों अधिकारियों को उनके संबंधित पदों से बर्खास्त कर दिया था।
बर्खास्तगी के इस आदेश के खिलाफ प्रतिवादी पक्ष ने अधिनियम की धारा 39(3) के तहत राज्य के ग्राम विकास मंत्री के समक्ष वैधानिक अपील दायर की। ग्राम विकास मंत्री ने 9 जून 2025 को विभागीय आयुक्त के बर्खास्तगी वाले आदेश पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी।
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इस स्टे का नतीजा यह हुआ कि जांच में दोषी पाए गए दोनों अधिकारी पिछले एक साल से भी अधिक समय से बिना किसी रुकावट के अपने पदों पर बने हुए हैं, जबकि मामले पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। इसी से परेशान होकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी और एक माह की सीमा
न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश राज वाकोडे की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मंत्री द्वारा जून 2025 के बाद से इस मामले में कोई ठोस सुनवाई नहीं की गई है। अदालत ने कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि अधिनियम की धारा 39(3) के अनुसार, मामलों की संवेदनशीलता को देखते हुए अपीलों का निपटारा एक महीने की वैधानिक सीमा के भीतर होना चाहिए।
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आमतौर पर अदालतों के सामने ऐसे मामले आते हैं जहां मंत्री न तो अपील पर फैसला लेते हैं और न स्टे पर, जिससे सीटें खाली घोषित हो जाती हैं। लेकिन इस मौजूदा मामले में बिल्कुल विपरीत रवैया दिखा—जहां स्टे देकर मामले को बिना सुनवाई के लंबे समय के लिए लटका दिया गया है।
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मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री को निर्देश की प्रति
हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए ग्राम विकास मंत्री को आदेश की कॉपी मिलने के 3 सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, इस निर्णय की जानकारी अगले 2 हफ्तों में याचिकाकर्ता को देना अनिवार्य किया गया है। प्रशासनिक गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति राज्य के मुख्य सचिव को भेजी जाए, जिसे वे मुख्यमंत्री और कानून मंत्री के समक्ष आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रस्तुत करेंगे।
