हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
High Court Divorce Case: नागपुर में हाई कोर्ट ने एक डॉक्टर दंपति के तलाक मामले में एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसमें पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी गई थी। न्यायाधीश एम.एस. जावलकर और न्यायाधीश नंदेश देशपांडे ने माना कि पत्नी का असामान्य और आवेगी व्यवहार पति के प्रति ‘मानसिक क्रूरता’ के दायरे में आता है और इसी आधार पर विवाह को भंग करने का आदेश दिया गया।
याचिकाकर्ता डॉ. अमितकुमार बागड़िया का विवाह 9 मार्च 2019 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। दोनों पेशे से डॉक्टर हैं। पति ने सर्जिकल ऑन्कोलॉजी में अपनी पढ़ाई पूरी की है, जबकि पत्नी रेडियोडायग्नोसिस की विशेषज्ञ हैं।
पति द्वारा दायर तलाक की याचिका में पत्नी के अनियंत्रित और हिंसक व्यवहार का विस्तृत विवरण दिया गया था। घटना का जिक्र करते हुए पति ने बताया कि मुंबई के बांद्रा में मोटरसाइकिल पर जाते समय पत्नी बिना किसी कारण के चलती गाड़ी से कूद गई। सड़क पर हंगामा किया। पति को सरेआम थप्पड़ मारा और आत्महत्या करने की धमकी दी।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि मार्च 2021 में एक विवाद के दौरान पत्नी ने पति पर शारीरिक हमला किया, जिसमें उसने पति को लात मारी, खरोंचा और दांतों से काटा, जिससे पति को काफी चोटें आईं और खून बहने लगा। घटना के कुछ दिन बाद पत्नी ने वाट्सएप मैसेज भेजकर अपने इस अनियंत्रित और तर्कहीन व्यवहार के लिए माफी भी मांगी थी।
पति ने शुरुआत में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) (क्रूरता) और 13(1)(iii) (दिमागी अस्वस्थता) के तहत तलाक मांगा था, लेकिन बाद में पत्नी को भविष्य में होने वाली असुविधा से बचाने के लिए ‘दिमागी अस्वस्थता’ का दावा वापस ले लिया था। फैमिली कोर्ट ने 18 अगस्त 2023 को पति की याचिका को खारिज कर दिया था।
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पूरी तरह गलत और कानून के विपरीत पाया। हाई कोर्ट ने विशेष रूप से ध्यान दिलाया कि निचली अदालत ने पत्नी द्वारा भेजे गए वाट्सएप संदेशों (जिनमें उसने अपनी गलती मानी थी) को तकनीकी आधार पर खारिज कर भारी भूल की, जबकि जिरह के दौरान पत्नी ने स्वयं स्वीकार किया था कि वे मैसेज उसी ने भेजे थे।
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अदालत ने माना कि पत्नी का व्यवहार पति के लिए मानसिक प्रताड़ना का कारण बना। इसके अलावा, हाई कोर्ट ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि पत्नी ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कोई याचिका दायर नहीं की, जो यह सिद्ध करता है कि उसका वास्तविक इरादा पति के साथ फिर से बसने का नहीं है, बल्कि वह केवल पति को तलाक मिलने से रोकना चाहती है।
अदालत ने कहा कि इतने लंबे अलगाव, लगातार कानूनी मुकदमों और पूरी तरह से टूट चुके वैवाहिक रिश्ते को जबरन बनाए रखना अपने आप में क्रूरता है। इन्हीं अहम टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए 9 मार्च 2019 को हुए इस विवाह को कानूनी तौर पर भंग (तलाक मंजूर) कर दिया।