कैंसर पेशंट्स की बढ़ी मुश्किलें, कोबाल्ट के लिए ‘सोर्स’ की किल्लत, मेडिकल परेशान
Nagpur Medical News: नागपुर के शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व अस्पताल में कैंसर जैसी बीमारी का इलाज करा रहे पेशंट्स की मुश्किलें अब बढ़ने वाली है। क्योंकि इलाज के लिए उनके पास 'सोर्स' की किल्लत है।
- Written By: प्रिया जैस
नागपुर मेडिकल कॉलेज (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Nagpur Medical College: कैंसर मरीजों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। विदर्भ में हेड एंड नेक कैंसर के मामले सर्वाधिक मिलते हैं। शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व अस्पताल का कैंसर विभाग निर्धन व जरूरतमंदों के लिए सहारा बना हुआ है लेकिन विभाग की कोबाल्ट मशीन में लगने वाले सोर्स के लिए अब तक निधि नहीं मिल सकी है।
मेडिकल में करीब 5 महीने चलेगा, इतना ही सोर्स है। इसके बाद मशीन बंद हो जाएगी। यदि मशीन बंद हुई तो स्नातकोत्तर यानी रेडिएशन ओंकोलॉजी की सीटों सहित पैरामेडिकल की सीटों पर संकट गहरा जाएगा। विभाग की कोबाल्ट मशीन से हर दिन 60-70 मरीजों को रेडिएशन दिया जाता है। नि:शुल्क उपचार होने से मरीजों को राहत मिलती है। प्राय: एक मरीज को एक से सवा महीने तक रेडिएशन की जरूरत होती है।
रेडिएशन के लिए डाला जाता है सोर्स
प्राइवेट अस्पतालों में यह खर्च 1 लाख रुपये से अधिक होता है जबकि विभाग में शासकीय सेवा के तहत नि:शुल्क इलाज होता है। मशीन में रेडिएशन के लिए सोर्स डाला जाता है। यह रेडियोएक्टिव पदार्थ होता है। इसकी कीमत करीब एक से सवा करोड़ रुपये तक होती है।
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सॉलिड फॉर्म में रहने वाले इस सोर्स के बिना रेडिएशन नहीं दिया जा सकता। फिलहाल मशीन में इतना सोर्स है कि वह करीब 5 महीने तक चल सके। सोर्स खत्म होने से पहले ही खरीदी की प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए।
एनएमसी के मापदंडों का होगा उल्लंघन
इस संबंध में विभाग द्वारा अधिष्ठाता कार्यालय को 2-3 पत्र दिये गये लेकिन अब तक निधि उपलब्ध नहीं हो सकी। निधि उपलब्ध होने के बाद खरीदी प्रक्रिया और उपलब्धता के लिए 2-3 महीने का समय लग जाता है। बताया जाता है कि मेडिकल प्रशासन द्वारा निधि के लिए जिला नियोजन समिति के पास प्रस्ताव भेजा गया है लेकिन अब तक समिति की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली।
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शासकीय स्तर पर यह सुविधा मेयो में भी उपलब्ध नहीं है। इस वजह से मेडिकल पर ही मरीजों की निर्भरता है। मशीन पर स्नातकोत्तर सहित पैरामेडिकल के विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। यदि मशीन बंद हो गई तो फिर उन्हें प्रशिक्षण नहीं मिलेगा।
इसके साथ ही नेशनल मेडिकल कमीशन के मापदंडों के अनुसार स्नातकोत्तर सीटों की मान्यता के लिए कोबाल्ट यूनिट आवश्यक है। यदि मशीन बंद पड़ जाती है तो स्नातकोत्तर के साथ ही पैरामेडिकल की सीटों पर भी संकट गहरा जाएगा। इस हालत में दिक्कतें बढ़ सकती हैं।
