नागपुर उपचुनाव विवाद में कोर्ट का फैसला, नामांकन रद्द बरकरार; उम्मीदवार को राहत नहीं

Nagpur High Court: केलवद ग्राम पंचायत उपचुनाव में नामांकन रद्द होने के मामले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिक्रमण के कारण अयोग्य ठहराए गए उम्मीदवार की पात्रता सिर्फ प्रमाणपत्र से बहाल नहीं होती।
Court Verdict in Nagpur By-election Dispute: Cancellation of Nomination Upheld; No Relief for Candidate
नागपुर हाई कोर्ट,(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur High Court Encroachment Case: नागपुर केलवद ग्राम पंचायत के उपचुनाव के लिए 13 अप्रैल 2026 को याचिकाकर्ता सुनील चैतरामजी कामडी ने अपना नामांकन भरा था। 15 अप्रैल 2026 को चुनाव अधिकारी ने उनके नामांकन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता अपने पिछले कार्यकाल के लिए पूरी तरह से अयोग्य घोषित किया जा चुका है।

इसे लेकर कामडी ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की जिस पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने उम्मीदवार का नामांकन रद्द किए जाने को उचित करार दिया। कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के कारण अयोग्य घोषित हो चुका है तो केवल अतिक्रमण हटाने का प्रमाणपत्र पेश करने से उसकी चुनाव लड़ने की योग्यता बहाल नहीं हो जाती।

पिता ने सरकारी जमीन पर किया था अतिक्रमण

इससे पूर्व सुनील कामडी ग्राम पंचायत के सदस्य चुने गए थे लेकिन उनके पिता द्वारा सरकारी भूमि पर अतिक्रमण किए जाने के कारण अतिरिक्त कलेक्टर ने 14 जुलाई 2023 को उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j - 3) के तहत अयोग्य घोषित कर दिया था। इस अयोग्यता के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय तक बरकरार रखा गया था। रिक्त हुए इसी पद के लिए उपचुनाव घोषित किए गए थे। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल के पिता द्वारा किया गया अतिक्रमण अब हटा दिया गया है। उन्होंने ग्राम पंचायत अधिकारी और पटवारी की एक समिति द्वारा जारी किया गया प्रमाणपत्र अदालत में पेश किया जिसमें अतिक्रमण हटने की बात कही गई थी। याचिकाकर्ता का दावा था कि इस प्रमाणपत्र के आधार पर उनकी अयोग्यता समाप्त हो गई है और चुनाव अधिकारी द्वारा उनका नामांकन रद्द करना मनमाना और अवैध है।

प्रमाणपत्र की वैधता शून्य

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने ग्राम पंचायत अधिकारी और पटवारी द्वारा जारी जिस प्रमाणपत्र पर भरोसा किया है उसका कोई वैधानिक आधार नहीं है। यह साधारण प्रमाणपत्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुष्ट की गई अयोग्यता के आदेश को निष्प्रभावी नहीं कर सकता। न्यायालय ने अधिनियम की धारा 16(1)(u) और (b) का हवाला देते हुए, स्पष्ट किया कि अयोग्यता उस पूरी अवधि होती है जिसके लिए सदस्य चुना गया था।

अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो मात्र अतिक्रमण हटा लेने से किसी अयोग्य सदस्य की चुनाव लड़ने की योग्यता को स्वतः बहाल कर दे। अदालत ने यह भी माना कि चुनाव प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी है (प्रतीक चिह्न आवंटन के चरण तक) और स्थापित कानून के अनुसार चुनाव प्रक्रिया के बीच में न्यायालय का हस्तक्षेप अनुचित है। सरकार की ओर से पेश हुए सहायक सरकारी वकील ने भी अदालत को बताया कि इसके लिए चुनाव याचिका का वैकल्पिक रास्ता मौजूद है।

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