नागपुर पुल विवाद: हाईकोर्ट का बड़ा संकेत, रेलवे-विवि से ज्यादा मिला मुआवजा, याचिका में नहीं दिखा मेरिट

Nagpur High Court Water Bridge: कन्हान नदी पुल निर्माण भूमि अधिग्रहण मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की मुआवजे की मांग पर असंतोष जताया कोर्ट ने कहा कि कानूनन उचित से अधिक मुआवजा दिया गया है।
Kanhan River Bridge Land Acquisition
कन्हान नदी पुलसोर्स- सोशल मीडिया
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Highlights

  • नागपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर कन्हान नदी के पुल के लिए अधिग्रहीत जमीन के मुआवजे को लेकर याचिका दायर की गई।

  • याचिकाकर्ता कृष्णा अग्रवाल ने रेलवे और विश्वविद्यालय की जमीन के मूल्यांकन से तुलना करते हुए भेदभाव का आरोप लगाया।

  • अदालत ने प्रथम दृष्टया याचिका में मेरिट नहीं होने के संकेत दिए और कहा कि कानूनी प्रावधानों के अनुसार मुआवजा दिया गया है।

  • याचिकाकर्ता की वकील बदलने की मांग स्वीकार करते हुए सुनवाई स्थगित की गई।

Kanhan River Bridge Land Acquisition: नागपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कन्हान नदी पर मुख्य पुल निर्माण के लिए अधिग्रहीत भूमि के मुआवजे की दर बढ़ाने की मांग करते हुए कृष्णा अग्रवाल की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई।

याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने याचिका में प्रथम दृष्टया कोई मेरिट नहीं होने के संकेत दिए। कोर्ट ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को कानून के तहत उचित मुआवजा प्रदान किया जा चुका है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता कृष्णा अग्रवाल अदालत में स्वयं उपस्थित थे और उन्होंने अपना वकील बदलने की इच्छा जताई। अदालत ने उनके निवेदन को स्वीकार करते हुए वकील को मामले से कार्यमुक्त कर दिया तथा याचिकाकर्ता को अगली तिथि से पहले वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था करने की अनुमति देते हुए सुनवाई स्थगित कर दी।

रेलवे और विवि से अधिक दिया मुआवजा

अदालत के निर्देश पर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने एक अतिरिक्त हलफनामा दायर कर भुगतान किए गए मुआवजे का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनव्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 तथा 12 मई 2015 के सरकारी संकल्प के प्रावधानों के अनुसार उपयुक्त मुआवजा दिया गया है।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता को मिला कुल मुआवजा रेलवे और विश्वविद्यालय को मिले मुआवजे से अधिक है। हलफनामे में यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे और विश्वविद्यालय की भूमि का अध्धिग्रहण नहीं किया गया था।

बल्कि उन्हें 35 वर्षों की अवधि के लिए लीज पर लिया गया था और एक सहमति पत्र (MoU) के तहत स्थानांतरित किया गया था। इस स्थिति को देखते हुए हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता रेलवे या विश्वविद्यालय के समान मुआवजे का दावा नहीं कर सकता।

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मुआवजे में भेदभाव का लगाया आरोप

याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रतिवादियों ने 1 जून 2025 को रेलवे और नागपुर विश्वविद्यालय की भूमि का मूल्यांकन 3,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से किया था। इसके विपरीत जब याचिकाकर्ता की भूमि के मूल्यांकन की बारी आई तो समिति ने स्लैब-वार दरें लागू कीं, इसमें 500 वर्ग मीटर तक के भूखंड के लिए 100 प्रतिशत बाजार दर तथा 501 से 2000 वर्ग मीटर तक के क्षेत्रफल के लिए १० प्रतिशत बाजार दर तय की गई।

याचिकाकर्ता ने मुरलीधर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के फैसले का हवाला देते हुए 3,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा देने की मांग की थी और असमान व्यवहार का आरोप लगाया था।

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