इसलिए गई 19 महिलाओं की जान! नागपुर ब्लास्ट की डरावनी सच्चाई आई सामने, पढ़ें इनसाइड स्टोरी

SBL Blast Nagpur: कलमेश्वर ब्लास्ट की डरावनी हकीकत आई सामने। 8 घंटे में 5000 डेटोनेटर का 'मौत वाला टारगेट'। 19 मौतों के बाद एसबीएल एनर्जी में शोषण का पर्दाफाश। नागपुर में न्याय की गुहार।
Investigation reveals deadly 5,000 detonator target per shift at SBL Energy Kalmeshwar plant. 19 dead, including 11 women. Protests erupt in Nagpur for justice.
एसबीएल एनर्जी लिमिटेड ब्लास्ट (सौजन्य-नवभारत)
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SBL Energy Limited Explosion: एसबीएल एनर्जी लिमिटेड के कलमेश्वर प्लांट में हुए भीषण विस्फोट ने न केवल 19 जिंदगियां ले लीं, बल्कि इस हाई-रिस्क इंडस्ट्री के भीतर चल रहे 'शोषण के खेल' को भी बेनकाब कर दिया।

हादसे के बाद जो जानकारियां सामने आ रही हैं, वे रोंगटे खड़े करने वाली हैं। जिस 'क्रिमपिंग' सेक्शन में सबसे ज्यादा मौतें हुईं, वहां आदिवासी और गरीब महिलाओं को किसी ट्रेंड प्रोफेशनल की तरह नहीं, बल्कि बंधुआ मजदूरों की तरह खटाया जा रहा था।

खेत से सीधे 'बारूद के ढेर' पर

सूत्रों के अनुसार इन एसबीएल एनर्जी लिमिटेड जैसी निजी विस्फोटक कंपनियों के लिए महिलाएं 'सॉफ्ट टारगेट' होती हैं। वे समय की पाबंद हैं। शिकायत नहीं करतीं और कम वेतन में भी जान जोखिम में डालने को तैयार हो जाती हैं। मृतकों में शामिल 11 महिलाएं इसी कड़वी सच्चाई का प्रमाण हैं। खेत में मजदूरी करने वाली इन भोली-भाली महिलाओं को बिना किसी ठोस ट्रेनिंग के सीधे सबसे संवेदनशील और खतरनाक 'डेटोनेटर हैंडलिंग' विभाग में तैनात कर दिया जाता है।

सांसों पर भारी 'टारगेट' का बोझ

हादसे में अपनी बहन पायल को खोने वाली नैना गायकवाड़ ने जो खुलासा किया, वह चौंकाने वाला है। नैना ने बताया कि एक महिला कर्मचारी को 8 घंटे की शिफ्ट में कम से कम 5,000 डेटोनेटर क्रिम करने का लक्ष्य दिया जाता है। सुपरवाइजर अक्सर धमकी देते हैं कि टारगेट पूरा नहीं हुआ तो काम से निकाल दिया जाएगा। उत्पादन बढ़ाने के लिए 'इंसेंटिव' का लालच दिया जाता है, जिससे महिलाएं और तेजी से काम करती हैं, जो बारूद के साथ काम करते समय जानलेवा साबित होता है।

सुरक्षा के नाम पर केवल 'दिखावा'

मजदूरों का आरोप है कि फैक्ट्री में सुरक्षा प्रोटोकॉल केवल कागजों तक सीमित थे। उन्हें बस मौखिक रूप से 'सावधानी बरतने' की सलाह दी जाती थी। इतनी जोखिम भरी नौकरी के बदले उन्हें महज 13,000 से 15,000 रुपये हाथ में मिलते थे।

खोने का मातम, इंसाफ की गुहार

नागपुर विभागीय आयुक्त कार्यालय के बाहर हृदयविदारक दृश्य देखने को मिले। कहीं मासूम बच्चे अपनी मां की तस्वीर लिए बैठे थे, तो कहीं भाई अपनी बहनों के लिए न्याय मांग रहे थे। एक घायल मजदूर ने बताया कि इससे पहले भी एक अन्य यूनिट में हुए हादसे में उसने अपने हाथ गंवा दिए थे, लेकिन आज तक उसे फूटी कौड़ी भी मुआवजे के तौर पर नहीं मिली।

जांच का विषय

क्रिमपिंग यूनिट जहां डेटोनेटर को सील किया जाता है, वहां पैडल से चलने वाली मशीनों का उपयोग होता है। शारीरिक थकान और ऊपर से काम का भारी दबाव ही अक्सर ऐसे बड़े धमाकों की वजह बनता है। क्या प्रशासन इन कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगाएगा या फिर गरीब मजदूरों की जान इसी तरह सस्ती बनी रहेगी?

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