नन्हे हाथों में सजे नंदी, घर-घर दस्तक और बदले में पैसे-चॉकलेट, नागपुर के तान्हा पोला की अनोखी परंपरा

Nagpur Tanha Pola Festival: नागपुर का 'तान्हा पोला' सिर्फ बच्चों का त्योहार नहीं, बल्कि लकड़ी के नंदी और बाल-टोलियों के साथ मनाई जाने वाली सदियों पुरानी ऐतिहासिक सांस्कृतिक परंपरा है।
Children carrying wooden Nandi bulls and women performing Tanha Pola rituals
तान्हा पोला नंदी बैल लेकर घूमते बच्चेप्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स: गूगल जेमिनी)
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Nagpur Tanha Pola Tradition : नागपुर का ‘तान्हा पोला’ सिर्फ बच्चों का त्योहार नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा है जिसमें लकड़ी के नंदी बैल, बच्चों की टोलियां और घर-घर मिलने वाले पैसे-चॉकलेट मिलकर बचपन की अनोखी तस्वीर बनाते हैं। पोला के दिन बच्चे अपने नंदी को सजाकर घर-घर ले जाते हैं, पूजा करवाते हैं और बदले में उन्हें पैसे, चॉकलेट या मिठाई मिलती है। आधुनिक दौर में भी यह परंपरा नागपुर की सांस्कृतिक पहचान को जिंदा रखे हुए है।

रंग-बिरंगे नंदी के साथ बच्चों की तैयारी

नागपुर की किसी गली में पोला के दिन अचानक बच्चों की टोलियां दिखाई देने लगें, हाथों में रंग-बिरंगे लकड़ी के नंदी हों और हर चेहरे पर उत्साह नजर आए, तो समझिए ‘तान्हा पोला आ गया है। यह वह दिन होता है जब बच्चों के लिए एक छोटा सा लकड़ी का नंदी किसी महंगे खिलौने से कम नहीं होता। उसे सजाने से लेकर घर-घर ले जाने तक बच्चे हर रस्म को पूरे उत्साह से निभाते हैं।

लकड़ी के नंदी की तैयारी से शुरू होता है उत्सव

तान्हा पोला से पहले ही बच्चों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। लकड़ी के नंदी को रंगा जाता है। उसके सींगों पर सजावट की जाती है और फूलों, कपड़ों या रंगीन सामान से उसे आकर्षक बनाया जाता है। नंदी जितना सुंदर दिखे, बच्चे का उत्साह उतना ही बढ़ जाता है। इसके बाद आता है वह पल, जिसका बच्चों को बेसब्री से इंतजार रहता है, अपने सजे हुए नंदी को लेकर घर से निकलना।

घर-घर पहुंचते हैं नन्हे ‘किसान’

तान्हा पोला की सबसे खास परंपरा है नंदी को लेकर घर-घर जाना। बच्चों की टोलियां अपने लकड़ी के नंदी के साथ पड़ोस के घरों में पहुंचती हैं। वहां नंदी की पूजा की जाती है। घर के बड़े बच्चों को आशीर्वाद देते हैं और खुशी से उन्हें पैसे, चॉकलेट या मिठाई देते हैं।

किसी बच्चे के लिए हाथ में आया सिक्का खुशी का कारण बनता है तो किसी के चेहरे पर चॉकलेट देखकर मुस्कान आ जाती है। कई बार बच्चों की असली खुशी इस बात में होती है कि उनके नंदी की तारीफ कितनी हुई।

बड़ों के पोला की परंपरा, बच्चों के नंदी के साथ

महाराष्ट्र राज्य के पोला पर्व में किसान अपने बैलों को नहलाकर सजाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। खेती में किसान के साथ बैलों के योगदान के प्रति सम्मान जताने वाला यह पर्व कृषि संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तान्हा पोला इसी परंपरा को बच्चों के संसार में लेकर आता है। असली बैलों की जगह यहां लकड़ी के नंदी होते हैं, लेकिन भावना वही रहती है, अपने नंदी को सजाना, उसकी पूजा करवाना और उसे सम्मान देना।

मोबाइल के दौर में भी नंदी का आकर्षण कायम

आज बच्चों के मनोरंजन दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। मोबाइल, वीडियो गेम और डिजिटल खिलौनों के बीच लकड़ी का एक साधारण नंदी शायद बहुत छोटा खिलौना लगे, लेकिन तान्हा पोला के दिन इसकी अहमियत बदल जाती है।

बच्चे उसे सिर्फ खिलौने की तरह नहीं देखते। उसके साथ जुड़ी होती है घर से निकलने की खुशी, दोस्तों के साथ घूमने का उत्साह और हर घर से मिलने वाले प्यार की उम्मीद। यही वजह है कि आधुनिकता के बावजूद तान्हा पोला की परंपरा अपनी चमक बनाए हुए है।

Children carrying wooden Nandi bulls and women performing Tanha Pola rituals
नागपुर में तान्हा पोला पर सजा बाजार, लकड़ी के बैलों की बिक्री और पुराने नंदी की डेंटिंग-पेंटिंग से मिला रोजगार

नंदी के साथ चलती है बचपन की कहानी

तान्हा पोला की खूबसूरती इसी में है कि यहां परंपरा किसी किताब में पढ़ाई नहीं जाती। बच्चे उसे खेलते-खेलते जीते हैं।

लकड़ी का नंदी उनके हाथ में होता है, गलियां उनका रास्ता होती हैं और घर-घर मिलने वाला प्यार इस परंपरा की सबसे खूबसूरत सौगात।

समय के साथ खेती बदली, बैलों की जगह आधुनिक मशीनों ने ली और बच्चों के खिलौने भी बदल गए। लेकिन नागपुर शहर का तान्हा पोला अब भी उसी मासूमियत के साथ कहता है,

“परंपरा पुरानी हो सकती है, लेकिन बचपन के उत्साह के साथ वह कभी पुरानी नहीं होती।”

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