

Equal Benefits Contract Employees: नागपुर हाई कोर्ट ने दिल्ली स्थित वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा दायर महत्वपूर्ण पुनर्विचार याचिका दोनों पक्षों की लंबी बहस के बाद खारिज कर दी। न्यायाधीश प्रवीण पाटिल के इस फैसले से कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी नियमित कर्मचारियों के समान कार्य कर रहे हैं तो वे समान लाभ के हकदार हैं। विशेषतः केंद्रीय श्रम आयुक्त द्वारा कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाए जाने के बाद हाई कोर्ट में इसे चुनौती दी गई थी।
हाई कोर्ट द्वारा उस आदेश को यथावत रखे जाने के बाद अब सीएसआईआर द्वारा हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की गई जिसमें सीएसआईआर ने हाई कोर्ट के 18 मार्च 2025 के उस फैसले की समीक्षा की मांग की थी जो रिट याचिका में पारित किया गया था।
सीएसआईआर ने याचिका में कई आधारों पर फैसले को चुनौती दी थी जिनमें यह दावा शामिल था कि उप मुख्य श्रम आयुक्त के समक्ष की गई कार्यवाही विचारणीय नहीं थी, कॉन्ट्रैक्ट लेबर रूल्स 1971 के नियम 25 (2) (वी) (ए) की गलत व्याख्या की गई है और मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है।
दलीलों को किया खारिज कोर्ट ने कहा कि 14 अगस्त 2013 को पूर्व की रिट याचिका में ही अदालत ने प्राधिकरण को इस मामले में नए सिरे से फैसला करने का निर्देश दिया था, इसलिए उप मुख्य श्रम आयुक्त के अधिकार क्षेत्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, कर्मचारियों ने वर्षों तक संविदा के आधार पर काम करने के बाद नियमितीकरण के लिए कार्यवाही शुरू की थी जिसे अदालत ने पूरी तरह से वैध माना।
सीएसआईआर के इस दावे पर कि उन्हें कर्मचारियों से जिरह करने का मौका नहीं मिला। नागपुर हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर स्पष्ट कियाकि मुख्य परीक्षा पूरी होने के बाद सीएसआईआर ने स्वयं गवाहों से जिरह करने का कोई अनुरोध ही नहीं किया था। मामले का सबसे अहम बिंदु कर्मचारियों के काम की प्रकृति से जुड़ा था।
अदालत ने कहा कि सीएसआईआर कोई भी ऐसा दस्तावेज पेश करने में विफल रहा जो यह साबित कर सके कि संविदा कर्मचारियों का काम अलग था। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी सीधे मुख्य नियोक्ता द्वारा नियुक्त नियमित कर्मचारियों के समान ही काम कर रहे हैं, इसलिए वे समान लाभ पाने के पूरी तरह हकदार हैं।
फैसला सुनाते हुए न्या। पाटिल ने सर्वोच्च न्यायालय के कई अहम फैसलों का विस्तार से हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुनर्विचार क्षेत्राधिकार के तहत अदालत एक अपीलीय न्यायालय की तरह व्यवहार नहीं कर सकती और मामले की दोबारा सुनवाई नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि पुनर्विचार का उपयोग केवल तभी किया जा सकता है जब आदेश में कोई ऐसी स्पष्ट गलती हो जो पहली नजर में ही दिखाई दे, यदि किसी फैसले में मेरिट के आधार पर कोई त्रुटि लगती भी है तो उसे अपील के माध्यम से ही सुधारा जा सकता है, न कि पुनर्विचार याचिका के जरिए।