नागपुर में ULC जमीन विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 0.65 हेक्टेयर भूमि से जुड़ी कार्रवाई खत्म

Nagpur High Court ULC Case: नागपुर पीठ ने ULC प्रकरण को समाप्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा भूमि का भौतिक कब्जा नहीं लिए जाने के कारण यह कार्रवाई स्वतः अप्रभावी हो जाती है।
Bombay High Court Nagpur Bench
भूमि का भौतिक कब्जा सोर्स- सोशल मीडिया
Published on: 
Updated on: 

Highlights

  • मामला नागपुर के वानाडोंगरी स्थित सर्वे नंबर 53, पुराने सर्वे नंबर 48/2 की भूमि से संबंधित है।

  • याचिकाकर्ताओं ने 0.65 हेक्टेयर यानी लगभग 69,965 वर्ग फुट जमीन पर अपना अधिकार और कब्जा होने का दावा किया।

  • हाई कोर्ट के अनुसार, भूमि का कब्जा लेने का प्रमाण रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया।

  • अदालत ने संबंधित ULC कार्यवाही को समाप्त और अप्रभावी घोषित कर दिया।

Bombay High Court Nagpur Bench: नागपुर में यूएलसी प्रकरण समाप्त होने और भूमि पर उनका अधिकार बना होने का हवाला देते हुए रिता पचेरीवाला और श्यामसुंदर अग्रवाल की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई।

याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश रजनीश व्यास ने महत्वपूर्ण फैसले में वानाडोंगरी स्थित 0.65 हेक्टेयर (69,965 वर्ग फुट) भूमि के संबंध में शहरी भूमि (अधिकतम सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत दर्ज यूएलसी मामले को समाप्त और अप्रभावी घोषित कर दिया।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार वानाडोंगरी स्थित भूमि सर्वे नंबर 53 (पुराना सर्वे नंबर 48/2) जमीन भैया महादेव वालदे के नाम थी। मूल मालिक ने 29 सितंबर 1976 को यूएलसी अधिनियम की धारा 6(1) के तहत रिटर्न दाखिल किया था।

जिसके आधार पर यूएलसी प्रकरण संख्या 2657/1976 दर्ज हुआ। 11 अक्टूबर 1987 को धारा 8 के तहत अधिसूचना जारी की गई। 16 दिसंबर 1987 के आदेश से घोषणाकर्ता को कुल 15579।21 वर्ग मीटर भूमि में से 1500 वर्ग मीटर भूमि रखने की अनुमति दी गई।

अतिरिक्त भूमि की सुपुर्दगी के लिए नोटिस

6 नवंबर 2007 को धारा 10(5) के तहत घोषणाकर्ता को अतिरिक्त भूमि की सुपुदगी के लिए नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि किसी भी समय भूमि का कब्जा नहीं लिया गया और वे आज भी 0.65 हेक्टेयर भूमि पर काचिज हैं।

उन्होंने बताया कि घोषणाकर्ता ने अपनी स्वामित्व वाली भूमि से अधिक भूमि बेच दी थी। वर्ष 1993 में घोषणाकतों ने 1.70 हेक्टेयर भूमि में से 0.81 हेक्टेयर भूमि सहकार कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड को विक्रय पत्र के माध्यम से बेची।

इस तथ्य का खुलासा किए बिना ही घोषणाकर्ता ने 17 नवंबर 1998 के पंजीकृत विक्रय पत्र से 1.00 हेक्टेयर भूमि याचिकाकर्ताओं को बेची। इसके बाद 9 दिसंबर 1998 के एक अन्य विक्रय पत्र से 0।46 हेक्टेयर भूमि याचिकाकर्ताओं को बेची गई।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि चूंकि घोषणाकर्ता ने अपनी स्वामित्व वाली भूमि से अधिक भूमि बेच दी, इसलिए उनके पक्ष में निष्पादित विक्रय पत्र केवल 0.65 हेक्टेयर भूमि तक ही वैध है।

Bombay High Court Nagpur Bench
स्मार्ट नागपुर का ट्रैफिक जाम: सड़कों पर ऑटो वालों की बेलगाम, चौराहों पर कब्जे से प्रशासन के दावों की खुली पोल

भूमि अधिकार अभिलेख में सरकार के नाम दर्ज

सरकार की ओर से जवाब में कहा गया कि पुराना सर्वे नंबर 48/2, नया सर्वे नंबर 53 के रूप में 1.70 हेक्टेयर क्षेत्र में दर्ज है और यह भूमि अधिकार अभिलेख में महाराष्ट्र सरकार के नाम दर्ज है।

याचिकाकर्ताओं के पक्ष में 17 नवंबर 1998 और 9 दिसंबर 1998 के विक्रय पत्र शून्य है क्योंकि ये उस भूमि के संबंध में निष्पादित किए गए थे जिसे अधिशेष भूमि घोषित किया गया था और उस समय यूएलसी अधिनियम प्रभावी था।

दोनों पक्षों की दलीलों के बाद कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बोल्टास प्रकरण में यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि यदि राज्य सरकार द्वारा भूमि का कब्जा नहीं लिया गया है तो कार्यवाही समाप्त हो जाएगी और आगे की कार्यवाही नहीं की जा सकती। राज्य की ओर से रिकॉर्ड पर एक भी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया, जो यह दर्शाता हो कि कब्जा लिया गया या घोषणाकर्ता ने सुपुर्द किया।

Navbharat Live
navbharatlive.com