नागपुर HC में कॉर्पोरेट पावर का इम्तिहान: करोड़ के बैंक ऋण मामले में CBI बनाम याचिकाकर्ता की दिलचस्प जंग

Nagpur Bank Fraud: हजारों करोड़ के बैंक ऋण मामले में फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर CBI कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट की वैधानिकता और उसके उपयोग पर सवाल उठाए हैं।
Test of Corporate Power at Nagpur HC: An Intriguing Battle Between CBI and Petitioner in a Multi-Crore Bank Loan Case
नागपुर हाई कोर्ट, बैंक ऋण मामला, (सोर्स: सोशल मीडिया)
Updated on

Nagpur Forensic Audit Report: नागपुर जिले में जनवरी 2019 की एक 'फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट' के आधार पर बैंक द्वारा केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा शुरू की गई कार्रवाई को चुनौती देते हुए अभिषेक मनोज जायसवाल की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता का दावा है कि जनवरी 2019 की फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट विशेष रूप से केवल 'आंतरिक उपयोग' के लिए थी। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि इस रिपोर्ट की भूमिका बेहद सीमित है, इसलिए इसे किसी भी प्रकार की दंडात्मक या सख्त कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता है।

अदालत को बताया कि रिपोर्ट के केवल आंतरिक उपयोग तक सीमित होने के बावजूद बैंक इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ रहा है और उसने सीबीआई के समक्ष कार्यवाही भी शुरू कर दी है। कॉर्पोरेट पावर लिमिटेड (सीपीएल) द्वारा लिए गए हजारों करोड़ के बैंक ऋण मामले में अब एक नया और दिलचस्प कानूनी मोड़ आ गया है।

बैंकों के कंसोर्टियम द्वारा सीबीआई में दर्ज कराई गई धोखाधड़ी की शिकायत को लेकर हाई कोर्ट में तीखी बहस चल रही है। एक तरफ जहां बैंक इसे सीधे तौर पर 'प्रोजेक्ट कॉस्ट' में हेराफेरी और धन के गबन का मामला बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ याचिकाकर्ता कंपनी ने फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट की वैधानिकता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए है।

अपनी ही सहयोगी कम्पनी को 4,332 करोड़ के प्रोजेक्ट

अदालत में बैंकों का पक्ष रखते हुए वकीलों ने बताया कि सीबीआई की शिकायत केवल फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट पर नहीं, बल्कि बैंक की आंतरिक जांच पर भी आधारित है। जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। जांच में पाया गया कि कंपनी ने 'प्रोजेक्ट कॉस्ट' (परियोजना लागत) में हेरफेर की और जमीन की कीमत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। CPL ने अपनी ही सहयोगी कंपनी' अभिजीत प्रोजेक्ट्स लिमिटेड' (जिसका नाम बाद में पाथब्रेकिंग प्रोजेक्ट्स लिमिटेड कर दिया गया) को 4,332 करोड़ रुपये के तीन प्रमुख ईपीसी कॉन्ट्रैक्ट दे दिए। बैंकों का आरोप है कि प्रमोटरों ने खुद के प्रबंधन वाली दूसरी कंपनी बनाकर उसे भारी भुगतान किया और वह पैसा कभी वापस नहीं आया, जो सीधे तौर पर फंड्स के गबन का मामला है।

आरबीआई द्वारा खाते को रेड फ्लैग

यह विवाद कॉर्पोरेट पावर लिमिटेड को बैंकों के एक कंसोर्टियम (जिसमें यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया आदि शामिल हैं) द्वारा दिए गए बड़े ऋण से जुड़ा है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा खाते को रेड फ्लैग किए जाने के बाद बैंकों ने फरवरी 2018 में जॉइंट लेंडर्स मीटिंग में इस खाते को धोखाधड़ी घोषित कर दिया था। इसके बाद यूनियन बैंक और आईडीबीआई की ओर से अगस्त 2021 में सीबीआई में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई थी।

ऑडिट रिपोर्ट के 'डिस्क्लेमर' और संपत्तियों की नीलामी

बैंकों ने यह भी तर्क दिया कि सिविल कोर्ट के पास इस स्तर पर सीबीआई की एफआईआर और आपराधिक शिकायत को रद्द करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है, खासकर तब जब शिकायत 2021 में दर्ज की गई हो और याचिका 2024 में दाखिल की गई हो।

कंपनी के बचाव पक्ष ने अदालत में जोरदार दलीलें पेश करते हुए पूरी आपराधिक कार्रवाई को ही चुनौती दी है। याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि जिस पीकेएस चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट को आधार बनाया गया है, उसमें साफ लिखा है कि यह केवल बैंक के आंतरिक उपयोग के लिए है।

ईडी रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि ऑडिटर किसी भी परिस्थिति में सीबीआई, या किसी अदालत के समक्ष गवाही नहीं देंगे और इस रिपोर्ट का इस्तेमाल कंपनी के खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिए नहीं किया जा सकता।

Navbharat Live
navbharatlive.com