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नागपुर में पैदल चलना हुआ जानलेवा! फुटपाथों पर अतिक्रमणकारियों का राज, बीच रोड चलने को मजबूर हुए आम लोग
- Written By: अंकिता पटेल
Nagpur Footpath Encroachment: नागपुर में फुटपाथों पर बढ़ते अतिक्रमण से पैदल चलना खतरनाक हो गया है। लोग मजबूरन सड़कों पर चल रहे हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

फुटपाथ अतिक्रमण, (सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur Footpath Encroachment Pedestrian Safety: नागपुर जिले में इन दिनों शहर में पैदल चलना अब सुविधा नहीं बल्कि जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, प्रमुख बाजारों और व्यस्त मार्गों के फुटपाथों पर अतिक्रमणकारियों का ऐसा कब्जा है कि आम नागरिकों को वाहनों के बीच से होकर सड़क पर चलने को मजबूर होना पड़ रहा है। हालत यह है कि जिस फुटपाथ का निर्माण लोगों की सुरक्षा के लिए किया गया था वह अब अवैध कारोबार और कब्जों का स्थायी ठिकाना बन चुका है।
अब शहर की सड़कों पर हर कदम पर डर महसूस होता है। फुटपाथो पर कब्जे के कारण सड़क पर चलना मजबूरी बन गया है और तेज रफ्तार वाहनों के बीच से निकलना किसी जोखिम से कम नहीं। कई बार छोटे बच्चों का हाथ कसकर पकड़ना पड़ता है क्योंकि जरा-सी चूक बड़ा हादसा करा सकती है। सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो किसी दिन बड़ी दुर्घटना हो सकती है।
उड़ रहीं सुको के आदेश की धज्जियां
सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर की खंडपीठ ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में पैदल चलने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (डी) के तहत स्वतंत्र आवागमन के अधिकार का हिस्सा माना है। सुको ने साफ कहा है कि सड़कों पर पैदल यात्रियों को प्राथमिकता देना स्थानीय निकायों और प्रशासन का अनिवार्य दायित्व है। बावजूद इसके शहर की तस्वीर न्यायालय के निर्देशों का मजाक उड़ाती दिखाई दे रही है।
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फुटपाथ नहीं, अतिक्रमणकारियों का साम्राज्य बन चुके हैं सार्वजनिक रास्ते
शहर के अधिकांश फुटपाथों पर तरी पोहा, चाय-नाश्ते और खानपान की अन्य सामग्री बेचने वालों ने स्थायी कब्जा जमा लिया है। इसके अलावा अनेक दुकानदारों ने अपनी दुकानों का सामान बाहर तक फैलाकर पैदल चलने वालों के लिए बनी जगह को ही निगल लिया है। कहीं ठेले हैं कहीं अवैध शेड और कहीं सड़क तक फैला कारोबार। ऐसे में नागरिकों के लिए फुटपाथ केवल कागजों में ही मौजूद हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में सरकारी जमीन पर कब्जे किसके संरक्षण में पनप रहे हैं? महानगरपालिका और स्थानीय प्रशासन समय-समय पर अभियान चलाकर फोटो खिंचवाने तक सीमित रहते हैं। कुछ घंटों की कार्रवाई के बाद अतिक्रमण फिर उसी
रफ्तार से लौट आता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अतिक्रमणकारियों को कहीं न कहीं प्रशासन की मौन स्वीकृति प्राप्त है।
सवालों के घेरे में मनपा और प्रशासन
जब शहर के फुटपाथों पर अवैध कब्जे खुलेआम दिखाई दे रहे हैं तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों को यह नजर नहीं आता? क्या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई है? आखिर आम नागरिकों को अपने ही शहर में सुरक्षित पैदल चलने का अधिकार कब मिलेगा? किसी भी शहर की पहचान उसकी सड़कें नहीं बल्कि वहां पैदल चलने वालों के लिए उपलब्ध सुरक्षित व्यवस्था होती है।
हालांकि जब फुटपाथ ही अतिक्रमणकारियों के हवाले कर दिए जाएं तो समझ लेना चाहिए कि शहर की व्यवस्था कमजोर पड़ चुकी है। यदि अब भी प्रशासन नहीं चेता तो यह केवल यातायात का संकट नहीं होगा बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर लगातार होता हुआ खुला अतिक्रमण माना जाएगा।
हर कदम पर मौत का खतरा, फिर भी जिम्मेदार बेखबर
रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और प्रमुख बाजार क्षेत्रों में लोगों की भीड़ सीधे सड़क तक पहुंच जाती है। बुजुर्ग, महिलाएं, दिव्यांग और स्कूली बच्चे वाहनों की आवाजाही के बीच रास्ता तलाशने को मजबूर हैं।
रोजाना हजारों लोग दुर्घटनाओं के खतरे के बीच सफर करते हैं लेकिन जिम्मेदार विभागों को शायद किसी बड़े हादसे का इंतजार है। शहर में हजारों वर्ग फीट सार्वजनिक भूमि पर अवैध अतिक्रमण मौजूद है।
इसके बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में कोई गंभीर पहल नजर नहीं आती। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि उचित फुटपाथ नहीं होने के कारण कोई व्यक्ति दुर्घटना का शिकार होता है तो वह कानूनी और संवैधानिक उपचार पाने का हकदार है।
इसके यदि प्रशासन पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ते उपलब्ध कराने में विफल रहता है तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है।
Footpath encroachment forces pedestrians onto roads raising safety concerns nagpur
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