नागपुर: सरकारी नौकरी का सपना दिखाकर वसूले लाखों, फर्जी सर्वेक्षण अधिकारी को कोर्ट ने सुनाई 3 साल की सजा
Nagpur Job Fraud: खुद को औरंगाबाद खंडपीठ का अधिकारी बताकर युवाओं से नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये ठगने वाले आरोपी को अदालत ने 3 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।
- Written By: अंकिता पटेल
नौकरी ठगी, फर्जी अधिकारी,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur Recruitment Scam: नागपुर जिले में खुद को औरंगाबाद खंडपीठ का डेस्क व सर्वेक्षण अधिकारी बताकर युवाओं को अमरावती और यवतमाल जिला न्यायालय में लिपिक और सिपाही पद पर भर्ती कराने के नाम पर धोखाधड़ी करने वाले कलंब, उस्मानाबाद निवासी विजय रामचंद्र पटवर्धन उर्फ विजय राजेंद्र रण सिंह (32) को प्रथम श्रेणी न्याय दंडाधिकारी सोनाली जगताप ने दोषी करार देते हुए 3 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।
इस मामले में उसकी पत्नी चंद्रलेखा विजय रण सिंह अब भी फरार है। विजय उस्मानाबाद, औरंगाबाद और नांदेड़ में युवाओं को सरकारी नौकरी के लिए मार्गदर्शन करता था। इसकी आड़ में उन्हें ठगता है। उसने नांदेड़, उस्मानाबाद और अन्य जिलों के युवाओं को बताया कि वह उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ का सर्वेक्षण अधिकारी है।
उसी के माध्यम से न्यायालयों में कर्मचारियों की भर्ती की जाती है। अमरावती और यवतमाल जिला न्यायालय में सिपाही और लिपिक पद रिक्त हैं जिन पर भर्ती ली जा रही है। युवाओं को नौकरी दिलाने का झांसा देकर उसने 2 से 3 लाख रुपये में डील की थी।
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सर्वोच्च न्यायालय समिति का फर्जी लेटर
बाकायदा सर्वोच्च न्यायालय समिति, भारत सरकार के नाम पर फर्जी लेटर हेड तैयार कर लिया। यवतमाल जिलाधिकारी कार्यालय में एक कमरा भी हासिल कर लिया। उम्मीदवारों को विश्वास होना चाहिए इसीलिए उसने परीक्षा केंद्र की भी पूरी तैयारी की। उन्हें फर्जी हॉल टिकट भी दे दिया। सर्वोच्च न्यायालय समिति के नाम पर गांधीबाग स्थित आदर्श विद्या मंदिर स्कूल में परीक्षा केंद्र उपलब्ध करवाने का लेटर दिया।
इसके बाद उसने पुलिस बंदोबस्त उपलब्ध करवाने के लिए कोतवाली पुलिस स्टेशन को भी पत्र दिया। पुलिस को इस लेटर पर संदेह हुआ। तत्कालीन थानेदार मुकुंद ठाकरे ने जांच शुरू की। दोनों जिलों के जिलाधिकारी कार्यालय से संपर्क किया गया तो इस तरह की कोई भर्ती नहीं होने का पता चला और विजय का भंडाफोड़ हो गया।
कोतवाली थाने में विविध धाराओं के तहत मामला दर्ज कर विजय को गिरफ्तार किया गया लेकिन इस काम में उसकी मदद करने वाली पत्नी चंद्रलेखा गिरफ्तारी से बच रही। सब-इंस्पेक्टर नवनाथ देवकाते ने प्रकरण की जांच कर न्यायालय में आरोप पत्र दायर किया। सरकारी वकील निलीमा देविगरकर आरोप सिद्ध करने में सफल हुईं और न्यायालय ने विजय को सजा सुनाई। बतौर पैरवी अधिकारी एएसआई नितिन और गणपति ने अभियोजन पक्ष को सहयोग किया।
पहले भी दर्ज हो चुके अलग-अलग जिलों में 4 मामले
संदेह होने पर पुलिस परीक्षा केंद्र में पहुंची तो स्कूल के कार्यकारी अधिकारी ने भी परीक्षा को लेकर संदेह जताया। विजय को पत्र व्यवहार करने के बहाने थाने में बुलाया। कड़ी पूछताछ करने पर उसने सारी सच्चाई बता दी। उसने परीक्षा के नाम पर उम्मीदवारों से 20 लाख रुपये लिए थे। सभी लेटर फर्जी होने की जानकारी दी। बताया जाता है कि विजय लंबे समय से युवाओं को नौकरी के नाम पर ठगने का काम कर रहा था।
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उसके खिलाफ भंडारा सहित पश्चिम महाराष्ट्र के अलग-अलग जिलों में धोखाधड़ी के मामले दर्ज हैं। विजय ने सर्वोच्च न्यायालय समिति के नाम पर पूरे सरकारी तंत्र को हिलाकर रख दिया था। स्कूल में परीक्षा केंद्र हो या पुलिस का बंदोबस्त सभी जगह उसने फर्जी लेटर का उपयोग किया था। परीक्षा देने के लिए 20 उम्मीदवार नागपुर भी पहुंच चुके थे। इसी लेटर के जरिए विजय ने उनके रहने का इंतजाम एमएलए हॉस्टल में किया था।
