

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मामला जुलाई 2022 में गढ़चिरोली के कमलापुर इलाके में कथित माओवादी प्रचार सामग्री मिलने से जुड़ा है।
पुलिस ने डॉक्टर पर नक्सली कमांडरों को सामग्री पहुंचाने और उनका इलाज करने का आरोप लगाया है।
Nagpur CMO Naxalite Case: नागपुर जिले में सरकारी डॉक्टर के साथ नक्सली कनेक्शन जोड़ते हुए पुलिस की ओर से शुरू की गई फौजदारी कार्रवाई में हाई कोर्ट द्वारा नियमित जमानत याचिका खारिज करने के बाद इसे चुनौती देते हुए अब पूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. पवनकुमार उइके की ओर से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई।
एसएलपी पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायाधीश शील नागु की बेंच ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दायर करने के आदेश दिए, याचिकाकर्ता डॉक्टर की ओर से अधि। मनन डागा और अधि. राजेन्द्र डागा तथा राज्य सरकार की ओर से अधि। धर्माधिकारी ने पैरवी की।
अभियोजन पक्ष के अनुसार 28 जुलाई 2022 की रात गढ़चिरोली जिले में नक्सली शहीद सप्ताह' के दौरान पुलिस दल (एसआरपीएफ व सीआरपीएफ) गश्त पर था। गश्त के दौरान कमलापुर इलाके से डॉ. पवनकुमार उइके, एम्बुलेस चालक प्रफुल भट और व्यापारी अनिल भट को पकड़ा गया था।
पुलिस का दावा है कि उनके पास मौजूद बैग से प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के बैनर और प्रचार पर्चे बरामद हुए थे। इस संबंध में मामला दर्ज कर तीनों को 28 जुलाई 2022 को गिरफ्तार कर लिया गया था।
पुलिस जांच के बाद दाखिल आरोप पत्र में आरोपियों पर विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए है। जांच के दौरान पुलिस ने डॉ. पवनकुमार के पास से लैपटॉप, मोबाइल, मेमोरी कार्ड, प्रिंटर और नक्सली साहित्य जब्त करने का दावा किया।
पुलिस का आरोप है कि आरोपी ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स (अमेजन और फ्लिपकार्ट) के माध्यम से वाकी-टॉकी, जीपीएस, इलेक्ट्रॉनिक सामान, दवाइयां और अन्य सामग्री मंगवाकर अहेरी दलम के नक्सली कमांडरों को पहुंचाई और उनका इलाज भी किया।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधि। मनन डागा ने कहा कि आरोपी 4 वर्ष से अधिक समय से हिरासत में है और मुकदमे में कुल 39 गवाहों की जांच होनी बाकी है, जिससे मुकदमे के जल्द पूरा होने की कोई संभावना नहीं है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि यूएपीए के मामलों में मुकदमे में अत्यधिक देरी और लंबे कारावास के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों के आलोक में आरोपी जमानत का हकदार है।
मामले के अन्य दो सह-आरोपियों (प्रफुल भट और अनिल भट) को हाई कोर्ट द्वारा पहले ही जमानत दी जा चुकी है। आरोपी की ओर से दलील दी गई कि वह केवल एक सरकारी चिकित्सा अधिकारी के रूप में अपनी ड्यूटी निभा रहे थे और मरीजों का इलाज कर रहे थे। उनका कोई आपराधिक इरादा नहीं था।