ब्रह्मोस के पूर्व इंजीनियर निशांत अग्रवाल (फोटो सोशल मीडिया)
नागपुर. ब्रह्मोस मिसाइल की गोपनीय जानकारी पाकिस्तान के आईएसआई एजेंट को देने के मामले में लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद हाल ही में जिला सत्र न्यायालय ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिक रहे निशांत अग्रवाल को उम्र कैद की सजा सुनाई। जिला सत्र न्यायालय के इसी आदेश को चुनौती देते हुए सजा रद्द करने की मांग कर अब निशांत ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
जिस तरह से केदार मामले में राज्य सरकार की ओर से विशेष सरकारी वकील की नियुक्ति की गई थी, उसी तर्ज पर अब इस मामले में भी सरकार की पैरवी के लिए विशेष सरकारी वकील की नियुक्ति होने जा रही है। याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान अदालत को इसकी जानकारी दी गई। जिसके बाद कोर्ट ने एक सप्ताह का समय प्रदान कर सुनवाई स्थगित कर दी। जिला सत्र न्यायालय ने निशांत को आईटी एक्ट की धारा 66-F में 14 वर्ष की सजा सुनाई है। जिसमें से साढ़े 4 साल तक पहले ही जेल में रहा है। जिससे 14 वर्ष की उम्र कैद की सजा में से बचे 10 वर्ष जेल में काटने होंगे।
एटीएस की चार्जशीट का हवाला देते हुए बताया गया कि निशांत के लैपटॉप और हार्ड डिस्क का गहन जांच की गई। लैपटॉप में खुफिया और प्रतिबंधित रिकार्ड पाया गया था। इस तरह की 19 फाइल्स निशांत के लैपटॉप में थीं। आश्चर्यजनक यह है कि उसने लैपटॉप में एक सॉफ्टवेयर डाल रखा था। सॉफ्टवेयर के जरिए लैपटॉप से खुफिया और गंभीर विस्तृत जानकारी विदेशों में बैठे आतंकी संगठनों को मिल जाती थी। प्राथमिक स्तर पर पाया गया कि 4,47,734 कैच फाइल्स इस लैपटॉप और हार्ड डिस्क से लीक हुई है। इस तरह के कई गंभीर और पुख्ता सबूत उपलब्ध है। पूरा मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है जो काफी गंभीर है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, देश विघातक गतिविधियों में फंसाने के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ हनी ट्रैप लगाकर उसे जांल में फंसाया गया। कुरुक्षेत्र एनआईटी से 2013 की बैच के टॉपर निशांत को डीआरडीओ में वैज्ञानिक पद पर नियुक्ति मिली थी। अगस्त 2012 को प्लेसमेंट के बाद उसे नागपुर यूनिट में भेजा गया, जहां ब्रह्मोस यूनिट में कार्यरत था। सरकारी पक्ष के अनुसार यह देश की सुरक्षा का प्रश्न है। जिसे सहजता से नहीं लिया जा सकता है।