किचन में जाने से पत्नी को रोकना मानसिक क्रूरता है, बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? जानें पूरा मामला
Nagpur Domestic Violence Case: बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी को रसोई में जाने से रोकना IPC 498A के तहत क्रूरता है। कोर्ट ने पति की FIR रद्द करने से इनकार कर दिया।
- Written By: आकाश मसने
कॉन्सेप्ट फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Bombay High Court On Domestic Violence: वैवाहिक विवादों और घरेलू हिंसा के मामलों में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी को घर की रसोई (किचन) का उपयोग करने से रोकता है या उसे खाना बनाने की अनुमति नहीं देता, तो यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत ‘मानसिक क्रूरता’ की श्रेणी में आता है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला अकोला की एक महिला की शिकायत से शुरू हुआ था, जिसकी शादी नवंबर 2022 में नागपुर निवासी व्यक्ति से हुई थी। महिला ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद ही पति का व्यवहार बदल गया। उसे न केवल मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, बल्कि घर के बुनियादी अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया।
महिला द्वारा दर्ज FIR के अनुसार पति उसे किचन में प्रवेश करने से रोकता था। उसे घर में खाना बनाने की इजाजत नहीं थी और बाहर से खाना मंगवाकर खाने के लिए मजबूर किया जाता था। उसके आने-जाने पर पाबंदी थी और मायके जाने से भी रोका जाता था। पति द्वारा उसका सामान घर से बाहर फेंक दिया गया और उस पर तलाक के लिए दबाव बनाया गया।
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कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एक महिला के लिए अपने ही ससुराल में रसोई तक पहुंच न होना और अपमानजनक व्यवहार सहना गंभीर मानसिक वेदना का कारण है। कोर्ट ने कहा “इस चरण पर, यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त आधार हैं कि पति का व्यवहार जानबूझकर किया गया था, जिसका उद्देश्य महिला को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना था। पत्नी को किचन में न जाने देना प्रथम दृष्टया क्रूरता का मामला बनता है।”
पति को झटका, सास को राहत
पति ने हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में दलील दी थी कि पत्नी ने तलाक की अर्जी के बदले में यह झूठी FIR दर्ज कराई है। हालांकि, हाई कोर्ट ने पति की दलील को खारिज करते हुए उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रखने का आदेश दिया। दूसरी ओर, अदालत ने महिला की सास को बड़ी राहत दी। कोर्ट ने पाया कि सास के खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट, सामान्य और निराधार हैं। अदालत के अनुसार, केवल रिश्तेदार होने के नाते किसी को केस में घसीटना गलत है, इसलिए सास के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया गया।
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धारा 498A और ‘क्रूरता’ की परिभाषा
अदालत ने कानून की व्याख्या करते हुए दोहराया कि धारा 498A के तहत क्रूरता का अर्थ केवल शारीरिक मारपीट नहीं है। इसमें कोई भी ऐसा जानबूझकर किया गया कार्य शामिल है जो महिला को आत्महत्या के लिए उकसा सकता हो या जिससे उसकी मानसिक और शारीरिक सेहत को गंभीर खतरा पैदा होता हो।
