महाराष्ट्र में मई-जून से ओल्ड मॉन्क रम की बिक्री पूरी तरह प्रभावित है।
FSSAI ने न्यूट्रल स्पिरिट में फ्लेवर मिलाने पर उत्पाद के नाम पर आपत्ति जताई है।
कंपनी ने बॉम्बे हाईकोर्ट से याचिका वापस लेकर नए लेबल मंजूरी के लिए भेजे हैं।
Old Monk FSSAI Controversy: भारत के चर्चित शराब ब्रांड्स में शामिल Old Monk इन दिनों महाराष्ट्र में अपनी बिक्री को लेकर विवादों में है। राज्य में मई-जून 2026 से इसकी बिक्री प्रभावित है। इसकी वजह कोई सामान्य कारोबारी या सप्लाई से जुड़ी समस्या नहीं, बल्कि एक अहम सवाल है क्या न्यूट्रल स्पिरिट में रम का फ्लेवर मिलाकर तैयार किए गए पेय को 'रम' कहा जा सकता है?
FSSAI ने इसी मुद्दे पर आपत्ति जताते हुए महाराष्ट्र में ओल्ड मॉन्क के कुछ उत्पादों की बिक्री और वितरण पर रोक लगाई थी।
अब इस मामले में नया घटनाक्रम सामने आया है। ओल्ड मॉन्क बनाने वाली कंपनी मोहन रॉकी स्प्रिंगवाटर ब्रुअरीज ने 5 नवंबर को बॉम्बे हाईकोर्ट में अपनी याचिका वापस ले ली। कंपनी ने अदालत को बताया कि वह नए लेबल तैयार करके FSSAI के सामने पेश करेगी और उनसे मंजूरी मांगेगी। हालांकि, याचिका वापस लेने का मतलब यह नहीं है कि महाराष्ट्र में ओल्ड मॉन्क की बिक्री पर लगी रोक हट गई है।
ओल्ड मॉन्क का निर्माण महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के खोपोली स्थित प्लांट में किया जाता है। FSSAI ने इस प्लांट का निरीक्षण किया था। इसके बाद नियामक ने कुछ उत्पादों की बिक्री और वितरण पर रोक लगाने का आदेश जारी किया। यह कार्रवाई मुख्य रूप से उत्पाद की वास्तविक संरचना और बोतल पर दी गई जानकारी को लेकर की गई थी।
FSSAI का कहना था कि संबंधित उत्पादों में न्यूट्रल स्पिरिट के साथ बाहर से रम का फ्लेवर मिलाया जाता है। ऐसे में उन्हें सीधे 'रम' के नाम से बेचना सही नहीं है। नियामक के अनुसार, उत्पाद की वास्तविक प्रकृति और उसमें इस्तेमाल किए गए फ्लेवर की जानकारी लेबल पर स्पष्ट होनी चाहिए। इसके लिए 'रम-फ्लेवर्ड स्पिरिट' जैसी श्रेणी का उल्लेख जरूरी हो सकता है।
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। न्यूट्रल स्पिरिट एक तरह की अल्कोहल आधारित स्पिरिट होती है। FSSAI की आपत्ति यह है कि यदि किसी उत्पाद में मुख्य रूप से न्यूट्रल स्पिरिट का इस्तेमाल किया गया है और उसमें बाहर से रम का फ्लेवर मिलाया गया है, तो उसे वास्तविक रम के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
नियामक का तर्क है कि किसी पेय को रम, व्हिस्की या किसी दूसरी श्रेणी में रखने के लिए उसमें उस पेय की निर्धारित विशेषताएं और गुणवत्ता होनी चाहिए। सिर्फ रम का स्वाद या फ्लेवर मिलाने से वह अपने आप रम नहीं बन जाता।
दूसरी ओर, कंपनी ने अदालत में इस दलील का विरोध किया था। उसका कहना था कि वह लागू नियमों में दी गई परिभाषा के अनुसार ही उत्पाद तैयार कर रही है। इस तरह कंपनी और नियामक के बीच विवाद केवल बोतल पर लिखे शब्दों का नहीं, बल्कि उत्पाद की कानूनी पहचान का भी है।
FSSAI ने ओल्ड मॉन्क की बोतलों पर इस्तेमाल किए गए कुछ अन्य दावों पर भी आपत्ति जताई थी। इनमें '7 Years Old Blended' और 'Very Old Vatted' जैसे विवरण शामिल हैं।
नियामक का सवाल था कि यदि उत्पाद में बाहर से फ्लेवर मिलाया जाता है, तो उसे सात साल पुराना या लंबे समय तक पीपे में परिपक्व किया गया उत्पाद बताने का आधार क्या है? FSSAI ने इन दावों की तकनीकी सटीकता पर सवाल उठाए थे।
अदालत में सुनवाई के दौरान कंपनी ने लेबल में बदलाव करने की दिशा में कदम उठाया था। सितंबर में जमा किए गए संशोधित लेबल में 'Added Flavour' को प्रमुखता से दिखाया गया और '7 Years Old Blended' का विवरण हटाया गया। लेकिन नियामक की आपत्ति केवल उम्र के दावे तक सीमित नहीं थी। उसका सवाल उत्पाद को मूल रूप से 'रम' कहकर बेचने पर भी था।
कंपनी ने अगस्त 2026 में FSSAI के बिक्री रोकने के आदेश को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। 10 अगस्त को अदालत ने नियामक से जवाब मांगा, लेकिन तत्काल बिक्री पर लगी रोक हटाने का अंतरिम आदेश नहीं दिया।
31 अगस्त को भी अदालत ने तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद कंपनी ने लेबल में बदलाव करने की सहमति जताई और 3 सितंबर को संशोधित लेबल जमा किए। हालांकि, FSSAI ने इन बदलावों को पर्याप्त नहीं माना।
5 नवंबर को कंपनी ने अदालत में कहा कि वह नए लेबल के साथ सीधे नियामक के पास जाएगी। इसके बाद उसने अपनी याचिका पर जोर नहीं देने का फैसला किया। मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए मामले का निपटारा कर दिया।
फिलहाल इसका जवाब नहीं है। कंपनी ने हाईकोर्ट से याचिका वापस ली है, लेकिन FSSAI ने बिक्री बहाल करने की मंजूरी नहीं दी है। अब कंपनी को संशोधित लेबल नियामक के सामने पेश करने होंगे। उनकी जांच के बाद ही यह तय होगा कि उत्पाद किस श्रेणी और किस नाम से बेचा जा सकता है।
इसलिए महाराष्ट्र में ओल्ड मॉन्क की बिक्री दोबारा शुरू होने की कोई निश्चित तारीख फिलहाल सामने नहीं आई है। ग्राहकों को अभी नियामक के फैसले का इंतजार करना होगा।
नहीं। FSSAI की कार्रवाई दूसरे शराब निर्माताओं के कुछ उत्पादों तक भी पहुंची थी। यूनाइटेड स्पिरिट्स के कुछ उत्पादों को लेकर भी रम और व्हिस्की में बाहरी फ्लेवर के इस्तेमाल तथा लेबलिंग पर सवाल उठाए गए थे। कंपनी ने भी बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, उसके मामले में FSSAI ने बाद में अपना प्रतिबंधित करने वाला आदेश वापस ले लिया था और कंपनी ने अपनी याचिका वापस ले ली।
ओल्ड मॉन्क का मामला फिलहाल अलग है, क्योंकि इसके निर्माता को नए लेबल के लिए FSSAI की मंजूरी लेनी होगी। कंपनी ने अदालत में यह भी दावा किया था कि बिक्री पर रोक के कारण महाराष्ट्र सरकार को करीब 350 करोड़ रुपये के आबकारी राजस्व का नुकसान हुआ है। यह आंकड़ा कंपनी की ओर से अदालत में दी गई दलील है।
कुल मिलाकर, ओल्ड मॉन्क का विवाद अब अदालत से निकलकर नियामक की मंजूरी की प्रक्रिया तक पहुंच गया है। महाराष्ट्र में इसकी बिक्री कब शुरू होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि FSSAI नए लेबल और उत्पाद की श्रेणी को लेकर क्या फैसला करता है।