Vidhan Parishad Election: शिवसेना को हक की 7 सीटें चाहिए; शिंदे के नो कॉम्प्रोमाइज स्टैंड ने BJP की बढ़ाई धड़कन
Vidhan Parishad Election के लिए महायुति में बढ़ी सीटों की रस्साकशी। शिवसेना ने 7 सीटों पर दावा ठोककर बीजेपी की बढ़ाई मुश्किलें। जानिए क्या है एकनाथ शिंदे का नो कॉम्प्रोमाइज फॉर्मूला?
- Written By: गोरक्ष पोफली
सांकेतिक फोटो (सोर्स: एआई फोटो)
BJP vs Shivsena Seat Conflict: महाराष्ट्र Vidhan Parishad Election 2026 के लिए महायुति गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर घमासान तेज हो गया है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 7 सीटों पर अपना दावा ठोककर बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस बार शिवसेना किसी भी तरह की राजनीतिक कॉम्प्रोमाइज करने के मूड में नहीं है।
सात सीटों पर अड़ियल रुख
शिवसेना के वरिष्ठ नेता और मंत्री प्रताप सरनाईक ने स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी अब अपनी ताकत के अनुसार ही सीटों की मांग कर रही है। सरनाईक के अनुसार, पार्टी की बढ़ती ताकद को देखते हुए 7 सीटें मिलना उनका हक है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि लोकसभा और अन्य चुनावों के दौरान शिवसेना ने कई बार गठबंधन धर्म निभाते हुए अपनी सीटों की कुर्बानी दी है, लेकिन विधान परिषद चुनाव में अब कार्यकर्ता और नेता दोबारा वैसी स्थिति बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।
बीजेपी की बढ़ी चुनौती
प्राथमिक तौर पर बनी महायुति की सहमति के अनुसार, बीजेपी 12 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रही थी, जबकि शिवसेना को सिर्फ 3 और एनसीपी को 2 सीटें देने का फॉर्मूला तैयार था। लेकिन शिंदे सेना के सात सीटों वाले फॉर्मूले ने बीजेपी के गणित को बिगाड़ दिया है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए पीछे हटेगी या गठबंधन में टकराव की स्थिति पैदा होगी?
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एकनाथ शिंदे का विजन
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी नो कॉम्प्रोमाइज का स्टैंड लेकर स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी का विस्तार ही उनकी प्राथमिकता है। अब गेंद बीजेपी के पाले में है कि वह गठबंधन की एकता बनाए रखने के लिए अपनी सीटों का त्याग करती है या फिर सहयोगी दल को छोटा ही बनाए रखना चाहती है।
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महायुति पर संकट के बादल
पिछले कई दिनों से महायुति के भीतर सब कुछ ठीक नहीं होने के संकेत साफ नजर आ रहे हैं। कभी एनसीपी के नेताओं का शिवसेना (शिंदे गुट) में शामिल होना, तो कभी बच्चू कडू के सरकार विरोधी और विवादित बयान गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। इन तमाम घटनाक्रमों पर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की चुप्पी भी कई कयासों को जन्म दे रही है। वहीं, हाल ही में पार्थ पवार की सुनेत्रा पवार को सीएम बनाने की इच्छा जाहिर करने वाली बयानबाजी ने महायुति के आंतरिक समीकरणों में भूचाल ला दिया है।
इन विरोधाभासी स्थितियों के बीच अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर टिकी हैं। गठबंधन के चाणक्य माने जाने वाले फडणवीस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इन बढ़ते अंतर्विरोधों और महत्वाकांक्षाओं को रोकने की है। सवाल यह है कि क्या फडणवीस अपनी राजनीतिक कुशलता से इन असंतुष्ट स्वरों को शांत कर पाएंगे, या फिर यह ऑल इज वेल का दावा महायुति को बड़े संकट की ओर ले जाएगा?
