

Thackeray Faction MPs Meet Om Birla: महाराष्ट्र की राजनीति का महासंग्राम अब देश की राजधानी दिल्ली के गलियारों में पूरी तीव्रता के साथ पहुंच गया है। शिवसेना यूबीटी में मची बड़ी भगदड़ के बीच, उद्धव ठाकरे के वफादार सांसदों ने अपनी पार्टी के अस्तित्व और संवैधानिक मर्यादाओं को बचाने के लिए मोर्चा खोल दिया है। बुधवार को शिवसेना यूबीटी के वरिष्ठ नेताओं और सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर बगावत करने वाले सांसदों के खिलाफ कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।
बुधवार शाम करीब 5 बजे, सांसद अरविंद सावंत और अनिल देसाई ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से उनके कार्यालय में मुलाकात की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य उन अटकलों और चर्चाओं पर विराम लगाना था, जिसमें कहा जा रहा था कि उद्धव गुट के बागी सांसदों ने शिंदे गुट में शामिल होने के लिए आधिकारिक पत्र दिया है। बैठक के बाद अरविंद सावंत ने स्पष्ट किया कि लोकसभा अध्यक्ष को अब तक बगावत करने वाले सांसदों की ओर से कोई भी आधिकारिक पत्र या दस्तावेज प्राप्त नहीं हुआ है।
इस मुलाकात के दौरान ठाकरे गुट के सांसदों ने बेहद आक्रामक और तकनीकी रुख अपनाया। सांसद अनिल देसाई ने संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का कड़ा हवाला देते हुए कहा कि केवल विधिमंडल दल में दो-तिहाई बहुमत होना काफी नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक मूल राजनीतिक दल का किसी अन्य दल में विलय नहीं हो जाता, तब तक अलग हुए गुट को स्वतंत्र मान्यता नहीं दी जा सकती। देसाई ने जोर देकर कहा कि बागी सांसद किसी अन्य दल में तब तक शामिल नहीं हो सकते जब तक कि कानूनी प्रक्रिया पूरी न हो।
गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों से 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चा जोरों पर है, जिसके तहत दावा किया जा रहा है कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना के 9 में से 6 सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं। इन बागी सांसदों में नाम शामिल हैं-
वर्तमान में उद्धव ठाकरे के साथ केवल अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाझे ही मजबूती से खड़े नजर आ रहे हैं। सांसदों की इस बड़ी संख्या में कमी के कारण दिल्ली में उद्धव ठाकरे की ताकत घटती नजर आ रही है और संसद भवन स्थित उनके कार्यालय के भी हाथ से जाने की संभावना जताई जा रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अरविंद सावंत और उनकी टीम ने मांग की है कि बागी सांसदों के लिए सदन में अलग बैठने की व्यवस्था न की जाए और न ही उन्हें किसी अलग गुट के रूप में मान्यता दी जाए। इस पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उन्हें आश्वस्त किया है कि जो भी निर्णय लिया जाएगा, वह पूरी तरह से नियमों और संवैधानिक ढांचे के भीतर होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके कार्यालय को कोई भी आवेदन मिलने पर उसकी गहन जांच की जाएगी और उसके बाद ही कोई कदम उठाया जाएगा।
यह राजनीतिक उठापटक ऐसे समय में हो रही है जब चुनाव आयोग पहले ही फरवरी 2023 में एकनाथ शिंदे के गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता दे चुका है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली की इस कानूनी और राजनीतिक लड़ाई में 'संविधान' की जीत होती है या 'संख्या बल' की।