

शिंदे गुट की सुप्रीम कोर्ट में दलील, विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने से अयोग्यता याचिका बेअसर।
वकील ध्रुव मेहता ने विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों का हवाला दिया।
शिंदे गुट ने 2022 में बनी सरकार को पूरी तरह वैध बताया।
Shiv Sena Symbol Case Supreme Court: शिवसेना पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट ने उद्धव ठाकरे गुट की मांग पर सवाल उठाए। बुधवार को शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील ध्रुव मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के सामने दलील दी कि जिन विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की जा रही है, उस महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल अब समाप्त हो चुका है। ऐसे में विधायकों की अयोग्यता की मांग का अब कोई व्यावहारिक महत्व नहीं रह गया है।
यह विवाद वर्ष 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ एकनाथ शिंदे की बगावत से जुड़ा है। उस समय शिवसेना के कई विधायकों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर शिंदे को अपना नेता चुना था। इसके बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास आघाड़ी सरकार गिर गई और एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने।
उद्धव ठाकरे गुट ने शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। ठाकरे गुट ने बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग के साथ ही चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के उन फैसलों को भी चुनौती दी है, जिनके तहत शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को दिया गया था।
ध्रुव मेहता ने दलील दी कि अब विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, इसलिए विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग पर विचार करने का औचित्य नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 में शिंदे के नेतृत्व में बनी सरकार को शिवसेना के अधिकांश विधायकों का समर्थन प्राप्त था।
मेहता ने दलबदल विरोधी कानून का हवाला देते हुए कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास है। उन्होंने 'किहोटो होलोहन' मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष इस प्रक्रिया में एक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) की तरह काम करते हैं। ऐसे में उनके फैसलों की न्यायिक समीक्षा सीमित दायरे में ही की जा सकती है।
शिंदे गुट के वकील ने 21 जून 2022 को हुई विधायकों की बैठक का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस बैठक में एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता चुना गया था और भरत गोगावले को मुख्य प्रतोद नियुक्त किया गया था। मेहता के मुताबिक, ये दोनों फैसले वैध थे।
उन्होंने राजेंद्र सिंह राणा और सुभाष देसाई मामलों का उल्लेख करते हुए दोहराया कि ठाकरे गुट की ओर से विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग अब अप्रासंगिक हो चुकी है। ये सभी दलीलें शिंदे गुट के वकील की ओर से सुप्रीम कोर्ट में रखी गईं।