

Supreme Court Shiv Sena Symbol Bow And Arrow Hearing ECI: शिवसेना के नाम और धनुष-बाण चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग के फैसले के आधार पर कई अहम सवाल उठाए।
अदालत ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि शिवसेना के एक गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह सौंपने से पहले आयोग ने सभी उपलब्ध विकल्पों पर विचार किया था या नहीं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान पीठ ने चुनाव आयोग द्वारा विधायी बहुमत को महत्व देने के तरीके पर सवाल उठाया।
अदालत ने पूछा कि यदि दोनों गुटों के बीच विवाद था, तो क्या दोनों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह देकर अपने राजनीतिक समर्थन के आधार पर चुनाव लड़ने का विकल्प भी आयोग के सामने था।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि राजनीतिक दलों की मान्यता तय करने में चुनावी आंकड़े महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन स्थिति तब जटिल हो जाती है जब चुनाव जीतने के बाद विधायक अपनी राजनीतिक निष्ठा बदल लेते हैं।
अदालत ने यह सवाल उठाया कि ऐसे मामलों में चुनाव के दौरान मिले वोटों को बाद में किसी दूसरे राजनीतिक गुट के समर्थन के रूप में कैसे देखा जा सकता है।
सुनवाई के दौरान शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के विधायी बहुमत वाले परीक्षण का बचाव किया। उन्होंने 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा और लोकसभा चुनावों के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि शिंदे गुट के साथ अधिक निर्वाचित विधायक और सांसद थे। उनका तर्क था कि चुनाव आयोग को विधायी समर्थन को पार्टी और चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद में प्रासंगिक आधार मानने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में चुनाव आयोग के निर्णय की न्यायिक समीक्षा कर रहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि समीक्षा के दौरान यह देखा जा सकता है कि आयोग ने प्रासंगिक तथ्यों और संभावित विकल्पों पर समुचित विचार किया था या नहीं। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होने की जानकारी दी गई है।