

Supreme Court Shiv Sena Symbol Row: सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना विवाद पर गुरुवार को भी अहम सुनवाई हुई। डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे गुट के वकीलों की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि वह चुनाव आयोग की निष्पक्षता की जांच करेगा।
शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग के विवेक पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या शिवसेना विवाद पर फैसला लेने से पहले आयोग ने सभी विकल्पों पर विचार किया था।
उद्धव गुट के वकीलों का आरोप है कि शिवसेना मामले में चुनाव आयोग ने फैसला लेते समय नियमों का पालन नहीं किया।
खास तौर से भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची को नजरअंदाज किया गया, जिसमें कहा गया है कि सिर्फ विधायकों की संख्या के आधार पर पार्टी का फैसला नहीं लिया जा सकता है।
शिंदे गुट के वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने कहा कि सिर्फ विधायी बहुमत हमेशा उचित कसौटी नहीं हो सकता, खासकर तब जब अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो लेकिन चुनाव आयोग एक उच्च संवैधानिक संस्था है। अगर सभी उपलब्ध कसौटियों पर विचार करने के बाद आयोग यह निष्कर्ष निकालता है कि विशेष परिस्थितियों में अन्य कसौटियां लागू नहीं हो सकती, तो वह व्यावहारिक कसौटी अपना सकता है।
जस्टिस बागची ने कहा कि अगर तीनों कसौटियों की सीमाएं थी तो एक और विकल्प उपलब्ध था। दोनों गुटों को आरक्षित चुनाव चिन्ह का लाभ देने की जरूरत नहीं थी। दोनों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह देकर अपने दम पर चुनाव लड़ने के लिए कहा जा सकता था।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग ने किसी प्रासंगिक पहलू को ध्यान में रखा और क्या उस संभावित नतीजे पर विचार किया। हम यह नहीं कह रहे कि इस वजह से चुनाव आयोग का फैसला गलत हो जाएगा लेकिन यह देखना जरूरी है कि क्या सभी विकल्पों पर विचार किया गया था।
आयोग यह जरूर कह सकता है कि अंतरिम व्यवस्था में उसने भावनाओं या किसी अन्य कारण से किसी विकल्प को नहीं अपनाया, लेकिन आयोग के आदेश में ऐसी कोई स्पष्ट तार्किक वजह सामने नहीं आती है।