उद्धव गुट ने सामना में ईरान सुप्रीम लीडर को बताया शहीद, लिखा- खामेनेई ने किसी महाशक्ति के आगे नहीं टेके घुटने

Saamana Editorial on Khamenei: सामना के संपादकीय में ईरान के नेता खामेनेई को शहीद बताया गया। अमेरिका-इजरायल की आलोचना और भारत की चुप्पी पर उठाए गए कड़े सवाल।
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Saamana Editorial on Khamenei (डिजाइन फोटो)
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Shiv Sena UBT Iran Israel Stand: उद्धव ठाकरे गुट के मुखपत्र 'सामना' ने अपने ताजा संपादकीय में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई को 'शहीद' का दर्जा देते हुए केंद्र सरकार और वैश्विक महाशक्तियों पर तीखा प्रहार किया है। सामना ने खामेनेई की प्रशंसा करते हुए लिखा कि उन्होंने अमेरिका और इजरायल जैसी महाशक्तियों के सामने घुटने नहीं टेके और अपने देश की संप्रभुता के लिए अंत तक संघर्ष किया।

इस लेख ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है, जहाँ एक ओर शिवसेना (यूबीटी) इसे स्वाभिमान की लड़ाई बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अनावश्यक हस्तक्षेप मान रहे हैं।

"झुंडशाही" के खिलाफ अडिग रहे खामेनेई: सामना

संपादकीय में अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई को "झुंडशाही" करार दिया गया है। लेख के अनुसार, खामेनेई ने सद्दाम हुसैन या गद्दाफी की तरह देश छोड़कर भागने के बजाय अपनी मिट्टी पर बलिदान देना चुना। सामना ने दावा किया कि ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के नाम पर केवल इसलिए दबाव बनाया गया क्योंकि महाशक्तियां वहां की तेल और खनिज संपदा पर नियंत्रण चाहती हैं। लेख में बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को विस्तारवादी बताते हुए उनकी कड़ी आलोचना की गई है।

भारत की 'चुप्पी' पर तीखे सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए 'सामना' ने सवाल उठाया कि भारत अपने पारंपरिक मित्र ईरान के संकट के समय चुप क्यों है? लेख में याद दिलाया गया कि कश्मीर मुद्दे पर ईरान ने हमेशा भारत का वैश्विक मंचों पर समर्थन किया और मुश्किल समय में सस्ते दामों पर तेल उपलब्ध कराया। संपादकीय में आरोप लगाया गया कि इजरायल और अमेरिका के कूटनीतिक दबाव के कारण भारत सरकार ने अब तक खामेनेई के निधन पर स्पष्ट स्टैंड नहीं लिया है, जो कि देश की स्वतंत्र विदेश नीति के खिलाफ है।

समर्पण के बजाय संघर्ष का मार्ग

लेख में खामेनेई के एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया गया कि उन्होंने ईरानी युवाओं को हमेशा विज्ञान और शिक्षा की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, ताकि देश आत्मनिर्भर बन सके। 'सामना' ने लिखा कि खामेनेई ने अपने पूरे जीवन में किसी भी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं किया जो ईरान के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता हो। लेख के अंत में एक चुनौतीपूर्ण सवाल पूछा गया है कि क्या भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव को दरकिनार कर इस "महान नेता" के लिए शोक व्यक्त करने का साहस दिखाएगी?

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