बालासाहेब ठाकरे के पिता केशव का नाम प्रबोधनकार कैसे पड़ा? पढ़ें उनके बहुमुखी व्यक्तित्व की रोचक कहानी

Prabodhankar Thackeray Story: केशव ठाकरे 'प्रबोधनकार' कैसे बने? पढ़ें शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के पिता के प्रेरणादायक जीवन, समाज सुधार आंदोलन और ऐतिहासिक योगदान की पूरी कहानी।
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प्रबोधनकार ठाकरे की फोटो(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Prabodhankar Thackeray Life Story: महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे परिवार का दबदबा दशकों से रहा है, लेकिन इस ऐतिहासिक विरासत की वैचारिक और सामाजिक नींव केशव सीताराम ठाकरे उर्फ प्रबोधनकार ठाकरे ने रखी थी। वे शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के पिता और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे व मनसे प्रमुख राज ठाकरे के दादा थे।

17 सितंबर 1885 को रायगढ़ जिले के पनवेल में जन्मे केशव सीताराम ठाकरे केवल एक राजनीतिक या सामाजिक विचारक नहीं, बल्कि एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी लेखक, पत्रकार, इतिहासकार, वक्ता और नाट्यकर्मी थे।

धोडपकर से ठाकरे सरनेम तक का दिलचस्प सफर

प्रबोधनकार ठाकरे के पूर्वज मराठा साम्राज्य के दौरान धोडप किले के किलेदार थे। उनके परिवार का पारंपरिक उपनाम ठाकरे था। बाद में उनके परदादा पाली में बसे और दादा सीताराम पनवेल में बसने के कारण पनवेलकर कहलाए।

हालांकि, जब केशव के पिता ने उनका स्कूल में दाखिला कराया, तो पुराना पारिवारिक उपनाम ठाकरे ही दर्ज कराया। आगे चलकर केशव ठाकरे अंग्रेजी लेखक विलियम मेकपीस ठाकरे के साहित्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अंग्रेजी में अपने सरनेम की स्पेलिंग बदलकर Thackeray कर ली।

प्रबोधनकार नाम कैसे पड़ा?

केशव ठाकरे ने 16 अक्टूबर 1921 को प्रबोधन नाम से एक पाक्षिक/मासिक पत्रिका की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज में सामाजिक, धार्मिक और नैतिक चेतना जगाना था। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास पर इतने तीखे प्रहार किए कि जनता और विचारकों के बीच उनका नाम ही 'प्रबोधनकार ठाकरे' पड़ गया।

बाल विवाह के मंडप में आग और दहेज के खिलाफ गधों का विरोध

प्रबोधनकार ठाकरे बचपन से ही अन्याय और सामाजिक कुरीतियों के सख्त खिलाफ थे।

  • बाल विवाह का विरोध: जब देर 1920 के दशक में एक 65 वर्ष के बुजुर्ग का विवाह 12 साल की बालिका मंजू से कराया जा रहा था, तब युवा केशव ने सीधे विवाह मंडप में जाकर शादी रोकने की मांग की और बात न मानने पर मंडप के तंबू में माचिस जलाकर आग लगा दी।

  • दहेज विरोधी आंदोलन: दहेज प्रथा के खिलाफ उन्होंने 'स्वाध्याय आश्रम' और 'गोविंदाग्रज मंडल' के माध्यम से अनोखा विरोध प्रदर्शन शुरू किया। वे उन शादी के मंडपों के बाहर गधों को ले जाकर खड़े कर देते थे जहां दहेज लिया जाता था और दूल्हे को मजबूर करते थे कि वह दुल्हन के पिता को दहेज का पैसा वापस करे।

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दादर में सार्वजनिक नवरात्रोत्सव की ऐतिहासिक शुरुआत

1920 के दशक में दादर के सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडलों में सवर्ण रूढ़िवादियों का वर्चस्व था और वे दलितों तथा गैरब्राह्मणों को पूजादर्शन करने से रोकते थे। इसके विरोध में डॉ. बी.आर. अंबेडकर, राव बहादुर एस.के. बोले और प्रबोधनकार ठाकरे ने आंदोलन किया।

जब भेदभाव खत्म नहीं हुआ, तो प्रबोधनकार ठाकरे और उनके साथियों ने 1926 में 'लोकहितवादी संघ' के तहत दादर में पहला सर्वसमावेशी 'श्री शिव भवानी नवरात्र महोत्सव' शुरू किया। इसमें समाज के सभी वर्गों और दलितों को बिना किसी भेदभाव के शामिल किया गया और घटस्थापना के अवसर पर महार समुदाय के हाथों भगवा ध्वज फहराया गया।

बहुजन हिंदुत्व और सामाजिक न्याय की लड़ाई

प्रबोधनकार ठाकरे महात्मा ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहू महाराज और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। वे पुरोहितशाही और धार्मिक पाखंड के कड़े आलोचक थे, लेकिन उनका विरोध किसी जाति विशेष से द्वेष के बजाय सामाजिक समानता के लिए था।

उनके हिंदुत्व को 'बहुजन हिंदुत्व' कहा जाता है, जो संकीर्णता से मुक्त और सामाजिक न्याय पर आधारित था।

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संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन और बहुमुखी व्यक्तित्व

1950 के दशक में मुंबई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाने के लिए चले 'संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन' में प्रबोधनकार ठाकरे ने अग्रणी भूमिका निभाई और संयुक्त महाराष्ट्र समिति के संस्थापकों में शामिल रहे।

वे न केवल प्रखर वक्ता और पत्रकार थे, बल्कि उन्होंने 20 से अधिक पुस्तकें और खरा ब्राह्मण व टाकलेले पोर जैसे क्रांतिकारी नाटक लिखे। उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म 'श्यामची आई' में एक धार्मिक उपदेशक का अभिनय भी किया था। 20 नवंबर 1973 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी प्रगतिशील और निडर विचारधारा आज भी महाराष्ट्र के सामाजिकराजनीतिक जीवन की धरोहर मानी जाती है।

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