पुणे जमीन घोटाला: पार्थ पवार को मिलेगी क्लीन चिट या बढ़ेगी मुश्किल? बावनकुले ने सीलबंद रिपोर्ट पर तोड़ी चुप्पी
Pune Mundhwa Land Scam: पुणे मुंढवा जमीन विवाद में खरगे कमेटी की सीलबंद रिपोर्ट राजस्व मंत्री बावनकुले को मिली। क्या पार्थ पवार को मिलेगी क्लीन चिट? जानिए 1800 करोड़ के इस बड़े घोटाले का पूरा सच।
- Written By: आकाश मसने
महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले व पार्थ पवार (सोर्स: सोशल मीडिया)
Chandrashekhar Bawankule On Kharage Committee Report: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर पुणे का ‘मुंढवा जमीन घोटाला’ चर्चा के केंद्र में आ गया है। महायुति सरकार में राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने स्पष्ट किया है कि इस बहुचर्चित मामले की जांच के लिए गठित ‘खरगे कमेटी’ की रिपोर्ट अब सरकार के पास पहुंच चुकी है। हालांकि, रिपोर्ट अभी सीलबंद है और इसके अध्ययन के बाद ही अगले कदम की घोषणा की जाएगी।
बजट सत्र से पहले होगा फैसला
महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि अगले सप्ताह से महाराष्ट्र विधानमंडल का बजट सत्र शुरू हो रहा है, ऐसे में इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट को लंबित नहीं रखा जा सकता। रिपोर्ट मंगलवार को मेरे पास पहुंची है और इसे पढ़ने के बाद ही कार्रवाई तय की जाएगी। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि बजट सत्र के दौरान विपक्षी दल इस मुद्दे पर सरकार को घेर सकते हैं, इसलिए सरकार जल्द ही अपनी स्थिति साफ करना चाहती है।
क्या है 1800 करोड़ रुपये का यह विवाद?
यह पूरा विवाद पुणे के मुंढवा इलाके में स्थित महार वतन की 40 एकड़ जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि इस जमीन का बाजार मूल्य लगभग 1,800 करोड़ रुपये है, लेकिन इसे कथित तौर पर अजित पवार के पुत्र पार्थ पवार से जुड़ी कंपनी को मात्र 300 करोड़ रुपये में सौंप दिया गया। इतना ही नहीं, इस सौदे के लिए करीब 21 करोड़ रुपये की स्टाम्प ड्यूटी भी माफ कर दी गई थी।
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जब यह मामला उजागर हुआ, तो भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद इस सौदे को रद्द कर दिया गया और मामले की तह तक जाने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति (खरगे कमेटी) का गठन किया गया था।
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क्लीन चिट पर छिड़ी जंग
वर्तमान में इस रिपोर्ट के निष्कर्षों को लेकर दो अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। एक पक्ष का कहना है कि कमेटी ने पार्थ पवार को ‘क्लीन चिट’ दे दी है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि दमानिया ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है। दमानिया का तर्क है कि सरकारी जमीनों की बंदरबांट में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं और वह इस मामले में कड़ी कार्रवाई की मांग कर रही हैं।
अब सबकी नजरें राजस्व विभाग की उस फाइल पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि पार्थ पवार को राहत मिलेगी या महायुति सरकार की मुश्किलें और बढ़ेंगी।
