एनसीपी लीडर जयंत पाटिल एक बार फिर ईडी के निशाने पर, पश्चिमी महाराष्ट्र के 14 ठिकानों पर हुई छापेमारी
- Written By: मनोज पांडे
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मुंबई: एनसीपी के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल एक बार फिर से प्रवर्तन निदेशालय के निशाने पर आ गए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने मुंबई के बाद अब पश्चिमी महाराष्ट्र में कुल 14 स्थानों पर छापेमारी की गई। जिसमें राजारामबापु सहकारी बैंक का कार्यालय भी शामिल है। ईडी का आरोप है कि कई फर्जी केवाईसी देकर अकाउंट खुलवाए गए और उन अकाउंट्स से करोड़ों रुपयों के ट्रांजेक्शन किए गए.इस मामले में एक सीए की संदिग्ध भूमिका सामने आई है। जो कई लोगों और उनसे जुड़ी अलग-अलग फर्जी कंपनियां बनवाईं. जिसके जरिए कंपनियों के अकाऊंट में पैसे जमा करवाए गए फिर उन्हें बैंक से कैश में निकलवाए गए। इस मामले में कई बड़े उद्योगपतियों के नाम सामने आ रहा है। एनसीपी के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल से जुड़ा हुआ ये सहकारी बैंक बताया जा रहा है। ईडी दस साल पहले के एक हजार करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन की जांच के सिलसिले में छापेमारी कर रही है। ईडी को इस कथित घोटाले में बैंक अधिकारियों के शामिल होने का संदेह है इस बीच जांच के दायरे में चल रहे सीए के दफ्तर पर भी छापा मारा गया है। जिनमें से कुछ के घर शुक्रवार को ईडी की टीम ने छापेमारियां कीं। इनमें पारेख बंधू (दिनेश पारेख, सुरेश पारेख) का नाम सबसे ऊपर है। ईडी की टीम ने पांच बड़े प्यापारियों के ठिकानों पर भी जाकर सर्च ऑपरेशन किया।
जयंत पाटिल हैं मौन
ईडी की टीम शुक्रवार को सुबह 9 बजे ही चिन्हित ठिकानो पर पहुंच गई और रात ढाई बजे तक छापेमारी चलती रही। एनसीपी सूत्रों ने इस मामले में महाराष्ट्र एनसीपी अध्यक्ष जंयत पाटील का लिंक होने से इनकार किया है। जयंत पाटील का फिलहाल इस बारे में कोई बयान नहीं आया है। ईडी को शक है कि बैंक को सारे घोटाले की जानकारियां थीं। बैंक की ओर से जानबूझ कर उन जानकारियों को छुपाया गया।
तीन साल पहले की है केस
तीन साल पुराने इस मनी लॉन्ड्रिंग केस का खुलासा 2011 में दायर की गई एफआईआर के आधार पर जांच के दौरान हुआ। ये शिकायत जीएसटी विभाग की ओर से वैल्यू एडेड टैक्स पर फर्जी दावे के संबंध में की गई थी। फर्जी कंपनियों के फर्जी बिलों के आधार पर यह दिखाने का गोरखधंधा चल रहा था कि उसने इन व्यापारियों और उद्योगपतियों को कच्चे माल की सप्लाई की गई है। बदले में उन व्यापारियों और उद्योगपतियों की ओर से बिल क्लियरेंस के नाम पर आरटीजीएस के जरिए फर्जी कंपनियों के नाम से खुले बैंक अकाउंट्स में ट्रांसफर किए जा रहे थे। फिर उन पैसों को बैंक से कैश में निकाल लिया जा रहा था। सीए को इसके बदले कमीशन मिल रहा था। एक बार में तीस करोड़ तक कैश निकाले गए हैं। इसीलिए ईडी को शक है कि बैंक मैनेजमेंट की जानकारी में ये सारा खेल चल रहा था।
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बैंक की मिलीभगत का है शक
ईडी सूत्रों सी मिली जानकारी के अनुसार अधिकारीयों को शक है की जितने आसानी से पैसे को फर्जी इनवॉइस पर ट्रांसफर करने के बाद करोड़ों की मात्र में कैश की निकासी की जा रही थी। वो बैंक की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। इतना ही नहीं इस पुरे मामले में तथाकथित सीए जांच एजेंसियों के रडार पर है। क्या बैंक की मिलीभगत का ये सारा सिंडिकेट और उसको सेट करने का काम उसी सीए के जरिये तो नहीं हुआ है। फिलहाल छापेमारी के बाद मिले इनपुट के बाद तफ्तीश आगे जारी है।
