

Sunil Tatkare Chhagan Bhujbal NCP Conflict: महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन के भीतर चल रही सीट शेयरिंग की खींचतान के बीच अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के आंतरिक अनुशासन की भी धज्जियां उड़ती नजर आ रही हैं। मुंबई में आयोजित राकांपा की इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य आगामी जून महीने में होने वाले विधान परिषद और राज्यसभा चुनावों के लिए रणनीति तैयार करना था। लेकिन जैसे ही बैठक शुरू हुई, पार्टी के भीतर पिछले कई महीनों से सुलग रही असंतोष की चिंगारी अचानक भड़क उठी। प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे ने सीधे तौर पर पार्टी विधायकों और मंत्रियों की निष्ठा पर सवाल खड़े कर दिए।
सुनील तटकरे ने बेहद भावुक और आक्रामक अंदाज में कहा कि पार्टी को आगे बढ़ाने और संगठन के विस्तार के दौरान होने वाली हर राजनीतिक आलोचना का शिकार सिर्फ चुनिंदा नेताओं (विशेषकर उन्हें) को ही होना पड़ता है। उन्होंने नाराजगी जताते हुए पूछा कि जब विपक्ष उन पर व्यक्तिगत हमले करता है, तब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और विधायक चुप क्यों बैठ जाते हैं? तटकरे के इस सीधे हमले से बैठक में मौजूद मंत्री छगन भुजबल सख्ते में आ गए। भुजबल ने तुरंत खड़े होकर तटकरे के इस बयान पर कड़ा प्रतिवाद किया और कहा कि यह मंच अपनी व्यक्तिगत भड़ास निकालने का नहीं, बल्कि आगामी चुनावों की रणनीति तय करने का है।
नेताओं के बीच जुबानी जंग इस कदर बढ़ गई कि बैठक का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। इसी बीच, अजीत पवार के बेटे और युवा नेता पार्थ पवार ने इस विवाद पर अपनी गहरी नाराजगी जताई और सुनील तटकरे का मुख्य भाषण शुरू होने से ठीक पहले ही बैठक कक्ष से वॉकआउट (बाहर) कर दिया। इसके अलावा, पार्टी के एक और कद्दावर स्तंभ प्रफुल्ल पटेल भी इस पूरी बैठक से नदारद रहे। हालांकि, पटेल ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने अपने पूर्व-निर्धारित कार्यक्रमों के कारण अनुपस्थित रहने की सूचना नेतृत्व को पहले ही दे दी थी, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे महज एक इत्तेफाक नहीं मान रहे हैं।
राकांपा के भीतर मचे इस ताजा घमासान को इसलिए भी बेहद गंभीर माना जा रहा है क्योंकि कुछ समय पहले ही पार्टी द्वारा भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को सौंपी गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आधिकारिक सूची से सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल दोनों के नाम रहस्यमयी ढंग से गायब थे। उस घटना के बाद से ही दोनों नेताओं की नाराजगी की खबरें आ रही थीं, जो आज इस बैठक में पूरी तरह सच साबित हो गईं। आगामी विधानसभा चुनावों (Assembly Election 2026) से ठीक पहले अजीत पवार गुट के भीतर उभरी यह गुटबाजी महायुति के लिए भारी पड़ सकती है।