मुंबई-अलीबाग कॉरिडोर को मिली नई रफ्तार: पहले चरण में 96 किमी निर्माण, BOT मॉडल से घटेगा आर्थिक बोझ
Mumbai News: मुंबई-अलीबाग मल्टीमॉडल कॉरिडोर को BOT मॉडल पर हरी झंडी मिल गई है। पहले चरण में 96 किमी निर्माण होगा, जिससे यातायात सुगम होगा और सरकार पर आर्थिक बोझ घटेगा।
- Written By: सोनाली चावरे
BOT मॉडल पर बनेगा अब मुंबई-अलीबाग कॉरिडोर (pic credit; social media)
Maharashtra News: लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़ी विरार-अलीबाग मल्टीमॉडल कॉरिडोर परियोजना को आखिरकार नई रफ्तार मिल गई है। राज्य सरकार ने इस महत्वाकांक्षी प्रकल्प को ईपीसी (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट, कंस्ट्रक्शन) मॉडल की जगह अब बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) मॉडल पर मंजूरी दी है। इसके साथ ही महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास महामंडल (MSRDC) को पहले जारी ईपीसी निविदाओं को रद्द करने की अनुमति दी गई है। सरकार का दावा है कि इस बदलाव से परियोजना पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा और मुंबई महानगर क्षेत्र की यातायात व्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी।
करीब 126.3 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर विरार से अलीबाग तक बनाया जाएगा, जो वसई, भिवंडी, कल्याण, अंबरनाथ, पनवेल, उरण और पेण जैसे इलाकों से गुजरेगा। हालांकि, इस परियोजना की घोषणा एक दशक पहले हुई थी, लेकिन आर्थिक अड़चनों और कर्ज उपलब्ध न होने के कारण काम अटक गया था। अब सरकार ने पहला चरण मंजूर कर दिया है, जिसके तहत पालघर जिले के नवघर से रायगढ़ जिले के पेण तालुका के बलावली तक लगभग 96 किलोमीटर का हिस्सा बनाया जाएगा।
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विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकल्प के शुरू होने से मुंबई के उत्तरी उपनगरों और रायगढ़ के तटीय इलाकों के बीच कनेक्टिविटी आसान होगी। इससे जेएनपीटी बंदरगाह तक माल ढुलाई तेज होगी, नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा और मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक से जुड़ाव मजबूत होगा और लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आएगी। रायगढ़ और पालघर जिलों में रियल एस्टेट और औद्योगिक निवेश को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।
सरकार ने इस परियोजना के लिए 22,250 करोड़ रुपये की लागत से भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव भी मंजूर किया है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण पर संभावित ब्याज राशि को भी स्वीकृति दी गई है। जल्द ही एमएसआरडीसी की ओर से वित्तीय योजना और दस्तावेज तैयार कर लोकनिर्माण विभाग निविदा प्रक्रिया शुरू करेगा।
ईपीसी मॉडल में पूरी लागत सरकार पर होती, जिससे कर्ज न मिलने पर प्रकल्प रुक जाता। जबकि BOT मॉडल में निजी निवेशक निर्माण करेंगे, तय समय तक टोल वसूली कर लागत निकालेंगे और बाद में प्रकल्प सरकार को सौंप देंगे। इससे सरकार का आर्थिक दबाव काफी हद तक कम हो जाएगा।
