

Marathi Language Row Mumbai: मुंबई के माहिम इलाके से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और हिंदी-मराठी विवाद का एक नया मामला सामने आया है। मनसे सचिव अनीश खंडागले ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र के एक अधिकारी को केवल इसलिए 'मनसे स्टाइल' में सबक सिखाने की धमकी दी क्योंकि उसने मराठी में बात करने से इनकार कर दिया था। इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें नेता और बैंक कर्मचारी के बीच तीखी बहस देखी जा सकती है। मनसे नेता का दावा है कि अधिकारी ने बाद में लिखित माफी मांग ली है, जिसके बाद प्रस्तावित आंदोलन को फिलहाल टाल दिया गया है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक महिला और उसका बेटा लोन संबंधी समस्या को लेकर मनसे नेता के पास पहुँचे और अधिकारी पर सहयोग न करने का आरोप लगाया।
वायरल वीडियो में अनीश खंडागले बैंक अधिकारी से पूछते नजर आ रहे हैं, "क्या तुम्हें मराठी नहीं आती?" जब अधिकारी ने मना किया, तो नेता ने तंज कसते हुए कहा, "तुम मुंबई में बैंक ऑफ महाराष्ट्र में काम करते हो और तुम्हें स्थानीय भाषा नहीं पता? महाराष्ट्र में रहना है तो मराठी सीखनी होगी।" इस पर मध्य प्रदेश के रहने वाले बैंक अधिकारी ने तर्क दिया कि यह एक राष्ट्रीयकृत बैंक (Nationalized Bank) है और उसने लिखित नियम दिखाने की मांग की कि मराठी बोलना अनिवार्य कहाँ लिखा है। इस सवाल ने विवाद को और हवा दे दी।
अधिकारी के व्यवहार से नाराज खंडागले ने कैमरे की ओर मुड़कर कहा कि वे अब उसे 'मनसे स्टाइल' में जवाब देंगे। उन्होंने ब्रांच मैनेजर से स्पष्ट कहा कि इस अधिकारी का तत्काल ट्रांसफर किया जाए, अन्यथा वे बैंक के बाहर उग्र प्रदर्शन करेंगे। नेता का आरोप था कि अधिकारी ग्राहकों के साथ घमंडी तरीके से पेश आ रहा था। हालांकि, बैंक ऑफ महाराष्ट्र की ओर से इस मामले पर अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन खंडागले का दावा है कि बैंक ने कार्रवाई का भरोसा दिया है।
राज ठाकरे के नेतृत्व वाली मनसे लंबे समय से 'भूमिपुत्रों' और मराठी भाषा के मुद्दे पर आक्रामक रही है। पिछले साल भी मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा मराठी न बोलने पर मारपीट की कई घटनाएं सामने आई थीं। पार्टी प्रमुख राज ठाकरे ने इस साल की शुरुआत में भी उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासियों को चेतावनी दी थी कि महाराष्ट्र पर हिंदी थोपने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह ताजा घटनाक्रम एक बार फिर मुंबई जैसे महानगरीय शहर में भाषाई अस्मिता और कामकाज की भाषा के बीच के संघर्ष को उजागर करता है।