आखिर क्यों आनंद परांजपे को म्हाडा में पद देने के खिलाफ हैं सुनेत्रा पवार? परांजपे ने इस पर क्या कहा?
Mahayuti Rift: महायुति में मचा घमासान! म्हाडा उपाध्यक्ष पद पर आनंद परांजपे की नियुक्ति के खिलाफ सुनेत्रा पवार ने खोला मोर्चा। देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिख जताई नाराजगी। जानें क्या है पूरा विवाद।
- Written By: गोरक्ष पोफली
आनेद परांजपे और सुनेत्रा पवार (सोर्स: सोशल मीडिया)
Sunetra Pawar Opposes Anand Paranjpe Appointment: महाराष्ट्र में विधान परिषद चुनावों की सरगर्मी के बीच महायुति (भाजपा, शिवसेना-शिंदे गुट और राकांपा-अजित पवार गुट) के भीतर सीटों के बंटवारे और नियुक्तियों को लेकर मतभेद उभर कर सामने आए हैं। स्रोतों के अनुसार, उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने एक पत्र लिखकर इस राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। उन्होंने यह पत्र देवेंद्र फडणवीस को संबोधित करते हुए लिखा है, जिसमें शिवसेना नेता आनंद परांजपे की एक अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति का कड़ा विरोध किया गया है।
म्हाडा उपाध्यक्ष पद पर असहमति
स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार, विवाद का मुख्य केंद्र म्हाडा (MHADA) के उपाध्यक्ष का पद है। चर्चा है कि आनंद परांजपे को इस पद पर नियुक्त करने की तैयारी चल रही थी, लेकिन सुनेत्रा पवार ने आधिकारिक रूप से मांग की है कि इस नियुक्ति को तत्काल रोका जाना चाहिए। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस पद के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) जल्द ही अपनी ओर से कोई दूसरा नाम सुझाएगी, जिसे परांजपे की जगह नियुक्त किया जा सकता है।
आनंद परांजपे का राजनीतिक दल-बदल और नाराजगी
आनंद परांजपे हाल ही में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी छोड़कर शिवसेना में शामिल हुए हैं। वे लगभग 14 वर्षों तक राष्ट्रवादी कांग्रेस के एक वफादार कार्यकर्ता और नेता रहे थे। हालांकि, 14 मई को उन्होंने पार्टी के सभी पदों और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
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राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम थी कि वे विधान परिषद का टिकट न मिलने के कारण पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे थे। उनके इस्तीफे के तुरंत बाद उन्होंने शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) में प्रवेश किया, जिसे उनकी स्वगृही वापसी कहा गया। जैसे ही उनके शिवसेना में जाने के बाद म्हाडा में बड़ी जिम्मेदारी मिलने की खबरें आईं, अजित पवार गुट (NCP) ने अपना विरोध दर्ज कराया।
आनंद परांजपे की प्रतिक्रिया
इस पूरे प्रकरण पर आनंद परांजपे ने अत्यंत संयमित और कूटनीतिक प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राकांपा में बिताए गए लंबे समय के कारण उनके मन में सुनेत्रा पवार या उस दल के प्रति कोई व्यक्तिगत कड़वाहट या नाराजगी नहीं है। उन्होंने अजित पवार को अपना श्रद्धास्थान बताते हुए कहा कि भले ही उन्होंने पार्टी छोड़ दी हो, लेकिन वे उनके खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। परांजपे ने यह भी दावा किया कि वे किसी पद के लालच में शिवसेना में नहीं आए हैं और न ही उन्हें किसी पद का आश्वासन दिया गया है; उनका एकमात्र लक्ष्य अब अपनी नई पार्टी को मजबूत करना है।
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महायुति के भीतर समन्वय की कमी
यह घटनाक्रम दर्शाता है कि महायुति के भीतर घटक दलों के बीच समन्वय की कमी है, विशेषकर उन नेताओं को लेकर जो एक दल से दूसरे दल में जा रहे हैं। सुनेत्रा पवार का यह हस्तक्षेप न केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति का विरोध है, बल्कि यह गठबंधन के भीतर पावर शेयरिंग और प्रभाव को लेकर चल रही गहरी प्रतिस्पर्धा को भी रेखांकित करता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री इस विरोध के बाद क्या निर्णय लेते हैं।
