मुंबई महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल: NSO सर्वे में खुलासा-77% इलाज निजी अस्पतालों में
Maharashtra Health Survey: NSO सर्वे के अनुसार महाराष्ट्र में सिर्फ 18.6% मरीज सरकारी अस्पतालों में जाते हैं। प्राइवेट इलाज पर खर्च बढ़ा, ग्रामीण-शहरी दोनों क्षेत्रों में महंगाई तेज।
- Written By: अंकिता पटेल
महाराष्ट्र स्वास्थ्य सर्वे,(सोर्स: सौजन्य AI)
Maharashtra Private Hospital Cost: मुंबई में हाल ही में जारी नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (एनएसओ) के सर्वे के अनुसार महाराष्ट्र में पांच में से सिर्फ एक मरीज ही सरकारी अस्पतालों में जाता है। दूसरे राज्यों की तुलना में इस राज्य में 30 से ज्यादा सरकारी मेडिकल और डेंटल कॉलेज हैं। आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र में अस्पताल में भर्ती होने के कुल मामलों में से 77% प्राइवेट सेक्टर में और 18.6% सरकारी अस्पतालों में होते हैं।
जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए) के डॉ. अभय शुक्ला ने कहा, ‘यह 18.6% का आंकड़ा देश में सबसे कम दर है और यह महाराष्ट्र की स्वास्थ्य सेवा के निजीकरण की नाकाम नीति को उजागर करता है।”राज्य में स्वास्थ्य संबंधी महंगाई दर ज्यादा महाराष्ट्र में स्वास्थ्य संबंधी महंगाई दर भी ज्यादा है और मरीजों को अपनी जेव से भी ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
2017-18 के सर्वे से तुलना करने पर पता चलता है कि ग्रामीण इलाकों में अस्पताल में भर्ती होने का खर्च 87% बढ़ गया है। राज्य में प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती होने का खर्च महंगाई दर से दोगुनी रफ्तार से बड़ा है। NSO के ताजा सर्वे के मुताबिक, ग्रामीण महाराष्ट्र में प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च 44,580 रुपये है, जबकि शहरी इलाकों में यह 67,831 रुपये है। 2017-18 के सर्वे से तुलना करने पर पता चलता है कि महंगाई काफी बढ़ी है। इसमें ग्रामीण इलाकों में प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती होने का खर्च 23,821 रुपये और शहरी इलाकों में 42,540 रुपये था।
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शहरी-ग्रामीण खर्च में आया जबर्दस्त अंतर
सरकारी दस्तावेज से यह भी पता चला कि महाराष्ट्र में सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर ग्रामीण इलाकों में लोगों की औसतन 8,080 रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़े (जो 2018 में 5,606 रुपये थे) और शहरी इलाकों में यह सखर्च 364 रुपये रहा जो 2018 में 7,189 रुपये का) ज्यादातर खर्च दवाओं और डायग्नोस्टिक टेस्ट की निजी खरीद पर होता है, जबकि लोगों को सरकारी सुविधाओं में मुक्त स्वास्थ्य सेवा मिलनी चाहिए।
एनएसी के डेटा से यह भी पता चलता है कि केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाय) और राज्य की महात्मा फुले योजना (एमजेपी जेराव) जैसी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा देने में नाकाम रही है।
अपनी जेब से खर्च कर रहे लोग
कागजों पर हर किसी को 5 लाख रुपये तक के अस्पताल में भर्ती होने का कवरेज मिलता है। फिर भी, एनएसओ के नतीजों से पता बलता है कि महाराष्ट्र में अस्पताल में भर्ती होने का औसत कुल खर्च (सरकारी और निजी ग्रामीण और शहरी दोनों बक्षेत्रों में) 44,778 रुपये है और इसमें से 40,495 रुपये लोग अभी भी अपनी जेब से ही खर्च कर रहे है। इसका मतलब है कि हेल्थ कवरेज होने के बावजूद महाराष्ट्र में अस्पताल में भातीं होने का 90% खर्च लोग खुद ही उठाते हैं।
निजी अस्पतालों में डिलीवरी खर्च 16 गुना अधिक
लेटेस्ट नेशनल सैंपल सर्वे हेल्थ रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राइवेट अस्पतालों में बच्चे के जन्म का खर्च सरकारी अस्पतालों के मुकाबले लगभग 16 गुना ज्यादा है।
फिर भी प्राइवेट देखभाल की तरफ रुझान बढ़ रहा है, जिससे जेब से खर्च बड़ रहा है। पिछले वित्तीय वर्ष में प्राइवेट अस्पतालों में हर बच्चे के जन्म पर औसत जेब से खर्च 37,630 रुपये था, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह 2,299 रुपये था।
देश में हर 8 लोगों में से एक है बीमार भारत में हर 8 में से एक व्यक्ति बीमार है। दूसरे शब्दों में 100 में से 13 भारतीय किसी न किसी बीमारी से पीड़ित हैं। ऐसे लोगों की सर्वाधिक संख्या बच्चों और बुजुगों में पाई जाती है।
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शहरी इलाकों में बीमारी की दर ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा शहरों में लगभग 14.9 प्रतिशत लोगों ने किसी बीमारी से पीड़ित होने की जानकारी दी, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा लगभग 12.2 प्रतिशत था।
लिंग के आधार पर भी इसमें अंतर देखने को मिला। महिलाओं में बीमारी फैलने की दर 14.4 प्रतिशत थी, जबकि पुरुषों में यह 11.8 प्रतिशत थी।
