क्या जुइली दलवी की निर्दलीय उम्मीदवारी के पीछे एकनाथ का हाथ है? जानें MLC चुनाव में बगावत का इनसाइड ड्रामा

Mahayuti Rift: कोंकण Vidhan Parishad Election में जुइली दलवी की बगावत के पीछे क्या मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का पालकमंत्री प्लान है? जानें कैसे शिंदे का लोभ रोक सकता है अनिकेत तटकरे की राह?
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सांकेतिक फोटो (सोर्स: एआई फोटो)
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Eknath Shinde Masterplan: महाराष्ट्र की राजनीति में Vidhan Parishad Election ने एक ऐसा मोड़ ले लिया है, जहां गठबंधन के भीतर ही फ्रेंडली फाइट के नाम पर शह-मात का खतरनाक खेल शुरू हो गया है। सबसे बड़ा सवाल जो गलियारों में गूंज रहा है, वह यह है कि क्या रायगड-रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग सीट पर शिवसेना विधायक महेंद्र दलवी की बेटी जुईली दलवी का निर्दलीय नामांकन महज एक इत्तेफाक है या मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की कोई गहरी सोची-समझी रणनीति?

जुईली दलवी की उम्मीदवारी: बगावत या सोची-समझी चाल?

कोंकण की इस महत्वपूर्ण सीट पर महायुती ने आधिकारिक तौर पर राष्ट्रवादी कांग्रेस के अनिकेत तटकरे को मैदान में उतारा है। लेकिन नामांकन के आखिरी दिनों में जुईली दलवी का निर्दलीय पर्चा भरना महायुती की एकजुटता पर एक बड़ा प्रहार माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों और सूत्रों के बीच यह चर्चा तेज है कि इस बगावत के पीछे खुद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का हाथ हो सकता है। दावा है कि इसके पीछे रायगड के पालकमंत्री (Guardian Minister) पद का गहरा गणित छिपा है। दरअसल, शिवसेना चाहती है कि यदि वे तटकरे की उम्मीदवारी का समर्थन करते हैं, तो बदले में राष्ट्रवादी कांग्रेस को रायगड का पालकमंत्री पद शिवसेना के लिए छोड़ देना चाहिए। यह एक तरह की रणनीतिक सौदेबाजी है, जहां शिंदे अपनी महत्वाकांक्षा तभी छोड़ेंगे जब उन्हें उसी मूल्य की कोई दूसरी जगह या प्रतिष्ठित पद मिलेगा।

हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और!

एकनाथ शिंदे के इस रुख को लेकर सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि वे हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और वाली नीति अपना रहे हैं। एक तरफ वे अपनी पार्टी से आधिकारिक टिकट न देकर युति धर्म निभाने का नाटक कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अपने ही नेताओं के परिजनों को निर्दलीय मैदान में उतारकर सहयोगियों पर दबाव बना रहे हैं। मकसद साफ है या तो महायुती उनकी पालकमंत्री पद की मांग पूरी करे, या फिर चुनाव में अपने ही दिग्गज निर्दलीय उम्मीदवारों से जंग लड़ने को तैयार रहे।

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यही संदेह छत्रपति संभाजीनगर में भी गहरा रहा है, जहां कद्दावर मंत्री अब्दुल सत्तार के बेटे समीर सत्तार ने निर्दलीय नामांकन दाखिल किया है। इसे शिंदे सेना की मुश्किलें बढ़ाने वाला कदम बताया जा रहा है, लेकिन हकीकत में यह सहयोगियों को झुकाने का एक और औजार हो सकता है। इसी तरह, परभणी-हिंगोली में पूर्व विधायक विप्लव बजोरिया का पत्ता कटना और सईद खान को टिकट मिलना भी उसी असंतोष की आग को हवा दे रहा है, जो शिंदे गुट के भीतर सुलग रही है।

कुल मिलाकर, एकनाथ शिंदे का यह हठ महायुती के भविष्य के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। क्या यह शक्ति प्रदर्शन उन्हें रायगड का पालकमंत्री पद दिला पाएगा, या यह बगावत गठबंधन की नाव को डुबो देगी? 22 जून के नतीजे ही इस सियासी भूकंप की तीव्रता तय करेंगे।

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