प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स: सोशल मीडिया)
CSR Spending In Small Cities: महाराष्ट्र समेत देश में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) का खर्च लंबे समय तक एक तय पैटर्न पर चलता रहा है, जिसमें ज़्यादातर फंड मुंबई जैसे बड़े शहरों और उनके आसपास के इलाकों में केंद्रित रहा। इसके विपरीत, छोटे शहरों और औद्योगिक जिलों में पर्याप्त आर्थिक गतिविधि होने के बावजूद उन्हें अपेक्षाकृत कम सीएसआर फंड मिलता रहा। हालांकि, सत्वा कंसल्टिंग की रिपोर्ट ‘सीएसआर्स नेक्स्ट एक्ट’ के अनुसार अब यह रुझान धीरे-धीरे बदल रहा है। सीएसआर फंड का प्रवाह अब छोटे शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और जरूरतमंद इलाकों की ओर बढ़ने लगा है, भले ही बड़े शहरों का प्रभाव अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
भारत में सीएसआर का प्रावधान कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत लागू हुआ था, जिसके अनुसार पात्र कंपनियों को अपने औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत सामाजिक कार्यों पर खर्च करना अनिवार्य है। समय के साथ यह एक बड़ा वित्तीय स्रोत बन चुका है। वर्तमान में 4,000 से अधिक कंपनियां मिलकर हर साल लगभग 30,000 करोड़ रुपये सीएसआर पर खर्च करती हैं, जो देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पिछले तीन वर्षों में छोटे शहरों में सीएसआर खर्च में 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मदुरै, वाराणसी, मैसूर और वडोदरा जैसे शहरों में फंडिंग बढ़ने से यह संकेत मिलता है कि सीएसआर का दायरा अब बड़ा हो रहा है। इसी तरह औद्योगिक जिलों में भी अच्छी बढ़ोतरी देखी गई है। वित्तीय वर्ष 2022 से 2024 के बीच इन क्षेत्रों में सीएसआर फंड 120 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कुल सीएसआर खर्च में वृद्धि 30 प्रतिशत रही। इन जिलों की हिस्सेदारी 4.4 प्रतिशत से बढ़कर 7.4 प्रतिशत हो गई है।
देश के कुछ जिलों में यह वृद्धि विशेष रूप से देखी गई है। ओडिशा के झारसुगुड़ा को लगभग 549 करोड़ रुपये का सीएसआर फंड मिला, जबकि रायगढ़, जामनगर और बल्लारी को 295 से 402 करोड़ रुपये के बीच फंड प्राप्त हुआ। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से मेटल, माइनिंग और एनर्जी क्षेत्र की कंपनियों के कारण हुई है, जो अपने संचालन क्षेत्रों के आसपास निवेश करना पसंद करती हैं।
सीएसआर परियोजनाओं का स्वरूप भी अधिक स्थानीय होता जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2022-24 के दौरान लगभग 85 प्रतिशत प्रोजेक्ट एक ही जिले तक सीमित रहे और कुल खर्च का दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं पर हुआ। इसके बावजूद, सीएसआर वितरण और वास्तविक विकास आवश्यकताओं के बीच अभी भी असंतुलन बना हुआ है। लगभग 75 प्रतिशत सीएसआर खर्च 200 से कम जिलों में केंद्रित है, जिनमें से कई अपेक्षाकृत कम गरीब हैं, जबकि अधिक जरूरतमंद क्षेत्रों को अभी भी सीमित फंड मिल रहा है।
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सरकार द्वारा चिन्हित ‘आकांक्षी जिलों’ में भी सुधार देखा गया है। वित्तीय वर्ष 2015 में जहां इनका हिस्सा 1.3 प्रतिशत था, वहीं 2024 में यह बढ़कर 4.5 प्रतिशत हो गया है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अपने सीएसआर का लगभग 11 प्रतिशत इन जिलों में खर्च किया है, जो निजी कंपनियों की तुलना में अधिक है। 10 करोड़ रुपये से अधिक के सीएसआर बजट वाली बड़ी कंपनियां भी इन क्षेत्रों में अपनी भागीदारी बढ़ा रही हैं, जिनका लगभग 5 प्रतिशत फंड आकांक्षी जिलों में गया है।
सेक्टर के दृष्टिकोण से बीएफएसआई, एनर्जी और माइनिंग कंपनियों का योगदान सबसे अधिक रहा है। वहीं कंपनी का आकार भी सीएसआर रणनीति को प्रभावित करता है। छोटी कंपनियां हमेशा अपने राज्य या मुख्यालय के आसपास ही निवेश करती हैं, जबकि बड़ी कंपनियां कई राज्यों और जिलों में अपने प्रोजेक्ट्स फैलाती हैं। सीएसआर के क्रियान्वयन के तरीकों में भी बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां NGO की भूमिका प्रमुख थी, वहीं अब विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, इनक्यूबेटरों और कॉर्पोरेट फाउंडेशनों को भी अधिक फंड मिल रहा है। वित्तीय वर्ष 2024 में लगभग 20 प्रतिशत सीएसआर खर्च ऐसे संस्थानों के माध्यम से किया गया। अब सीएसआर का स्वरूप बदल रहा है। यह बड़े शहरों तक सीमित रहने के बजाय छोटे शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक फैल रहा है।