फार्मेसी कॉलेजों पर संकट: महाराष्ट्र के 176 कॉलेज मान्यता खोने की कगार पर, मुंबई के 27 शामिल

Mumbai News: महाराष्ट्र के 176 फार्मेसी कॉलेज आवश्यक सुविधाओं की कमी के चलते मान्यता खोने की कगार पर हैं। मुंबई के 27 समेत नागपुर और अन्य जिलों के कॉलेज पीसीआई मानदंडों पर खरे नहीं उतरे है।
मुंबई विश्वविद्यालय (pic credit; social media)
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Mumbai Pharmacy College: महाराष्ट्र में फार्मेसी शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। डिग्री और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए जरूरी सुविधाओं की कमी के चलते राज्य के 176 फार्मेसी कॉलेजों पर मान्यता खोने का खतरा मंडरा रहा है।

तकनीकी शिक्षा निदेशालय ने हाल ही में उन कॉलेजों की सूची जारी की है जिन्हें अगस्त में नोटिस भेजा गया था। इनमें अकेले मुंबई के 27 कॉलेज शामिल हैं। इनमें डिग्री पाठ्यक्रमों के 14 और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के 13 कॉलेज हैं। ठाणे जिले के 15 कॉलेजों और पालघर जिले के 5 कॉलेजों का नाम भी इस सूची में है।

फार्मास्युटिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के मानदंडों के अनुसार इन कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं ही मौजूद नहीं हैं। निरीक्षण के दौरान सामने आया कि डिग्री पाठ्यक्रमों के 92 में से 48 और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के 220 में से 128 कॉलेज पात्रता मानकों पर खरे नहीं उतरते।

राज्य में 2022-23 से लेकर 2024-25 के बीच फार्मेसी कॉलेजों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। लेकिन इतने कम समय में इतने कॉलेजों को मंजूरी देने के बाद भी उनके पास बुनियादी सुविधाओं का अभाव चौंकाने वाला है।

रिपोर्ट के अनुसार, कई कॉलेजों में प्रयोगशालाओं की कमी है, स्टाफ की संख्या पीसीआई के तय मानकों से कम है, वहीं अग्नि सुरक्षा और अधिभोग प्रमाणपत्र जैसी अनिवार्य सुविधाएं भी नहीं हैं।

क्षेत्रवार स्थिति देखें तो छत्रपति संभाजीनगर सबसे आगे है जहां 60 कॉलेजों में कमियां पाई गईं। इनमें 55 डिप्लोमा और 5 डिग्री पाठ्यक्रमों के कॉलेज हैं। इसके बाद नागपुर में 42 कॉलेजों का नाम इस सूची में शामिल है। पुणे में 27, नाशिक में 16 और अमरावती में 4 कॉलेज पात्रता मानदंडों पर खरे नहीं उतरे। रायगढ़ और रत्नागिरी में तीन-तीन और सिंधुदुर्ग में एक कॉलेज पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है।

तकनीकी शिक्षा निदेशालय की रिपोर्ट के बाद राज्य में फार्मेसी शिक्षा की गुणवत्ता पर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कॉलेज मानकों पर खरे नहीं उतरते तो छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ होगा और फार्मेसी क्षेत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे।