मेलघाट में कुपोषण से एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई, बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार को लगाई कड़ी फटकार
Melghat Malnutrition Case: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मेलघाट में कुपोषण और शिशु मृत्यु दर पर सरकार की उदासीनता की आलोचना की। कोर्ट ने दो हफ्ते में उठाए गए कदमों की रिपोर्ट मांगी है।
- Written By: आकाश मसने
कॉन्सेप्ट फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Bombay High Court On Melghat Malnutrition: महाराष्ट्र के मेलघाट क्षेत्र में पिछले तीन दशकों से जारी कुपोषण की गंभीर समस्या पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए इसे ‘दुखद’ करार दिया है। जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस अभय मंत्री की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि मेलघाट की वर्तमान स्थिति सरकार की अपनी ही नीतियों को जमीन पर लागू करने में विफलता का प्रमाण है।
बॉम्बे हाई कोर्ट पिछले 3 दशकों से अमरावती जिले के मेलघाट और उसके आस-पास के इलाकों में कुपोषण के कारण होने वाली शिशु मृत्यु दर, गर्भवती या दूध पिलाने वाली माताओं की मौतों पर नजर रख रहा है। कोर्ट ने समय-समय पर आदेश भी जारी किए हैं। हालांकि, कोर्ट के दखल के बावजूद यह समस्या बनी हुई है।
राज्य सरकार की उदासिनता पर कोर्ट का प्रहार
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कड़ी राय दर्ज करते हुए कहा कि यह एक दुखद घटना है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार की उदासीनता की भी आलोचना की। जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस अभय मंत्री की बेंच ने सरकार की भी आलोचना की कि मेलघाट की यह स्थिति सरकार की अपनी नीतियों को ठीक से लागू करने में विफलता का संकेत है।
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‘एक पूरी पीढ़ी हो गई बर्बाद’
पिछले 25 वर्षों से आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए समर्पित डॉ. आशीष सातव ने कोर्ट के समक्ष चौंकाने वाले तथ्य रखे। उन्होंने बताया कि कुपोषण और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण पिछले दो दशकों में युवाओं की एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई है। उन्होंने कहा कि मेलघाट इलाके में मेडिकल सुविधाओं की कमी इतनी है कि एक मरीज को तुरंत खून की जरूरत थी, जिसके लिए उसने अपने खर्चे पर खून खरीदा। इसके साथ ही, उन्होंने सरकार को कुछ उपाय और सुझाव भी सौंपे हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार को दो हफ्ते के अंदर उठाए गए और उठाए जाने वाले कदमों की जानकारी देने का आदेश दिया।
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मजदूरों की बकाया मजदूरी का संकट
सुनवाई के दौरान मेलघाट में मनरेगा (MNREGA) के तहत काम करने वाले 25,000 से अधिक दिहाड़ी मजदूरों का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि इन मजदूरों की सैलरी के लिए 7 करोड़ रुपये का फंड मंजूर होने के बावजूद उन तक पैसा नहीं पहुंचा है।
कोर्ट ने सरकार से सवाल किया कि ‘विकसित भारत ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ शुरू करने की चर्चाओं के बीच, उन पुराने मजदूरों के हक का क्या होगा जिनकी मजदूरी बकाया है? हाई कोर्ट ने सरकारी वकीलों को निर्देश दिया है कि वे मजदूरों के बकाया भुगतान को लेकर स्थिति स्पष्ट करें।
