जनता के पैसों की बर्बादी! 6 महीने पहले खरीदी स्कॉर्पियो नापसंद, अब BMC पदाधिकारियों को चाहिए 'इनोवा क्रिस्टा'

BMC Officers Car Controversy: 6 महीने पहले 2.16 करोड़ में खरीदी स्कॉर्पियो-एन ऑफिसर्स को पसंद ना आने पर बीएमसी अब 'इनोवा क्रिस्टा' खरीदेगी। किशोरी पेडनेकर ने उठाए सवाल।
BMC New Car Controversy
बीएमसी पदाधिकारियों की नई गाड़ियों की मांग (प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स-AI)
Published on: 
Updated on: 

BMC New Car Controversy: देश की सबसे अमीर महानगरपालिका बृहन्मुंबई महानगरपालिका एक बार फिर जनता और करदाताओं के पैसों की फिजूलखर्ची को लेकर विवादों के घेरे में आ गई है। महज छह महीने पहले जनवरी-फरवरी में करीब 2 करोड़ 16 लाख रुपये खर्च करके खरीदी गईं 'स्कॉर्पियो एन' (Scorpio N) गाड़ियों को अब बदलकर महंगी 'इनोवा क्रिस्टा' (Innova Crysta) खरीदने की तैयारी की जा रही है।

प्रशासनिक अधिकारियों और पदाधिकारियों का दावा है कि मौजूदा स्कॉर्पियो गाड़ियां सफर के लिए 'आरामदायक' नहीं हैं। यह नया प्रस्ताव जल्द ही नगर आयुक्त अश्विनी भिडे की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

6 महीने पहले 13 नई गाड़ियों पर खर्च हुए थे 2.16 करोड़ रुपये

नगर निगम चुनावों से ठीक पहले प्रशासनिक शासन के दौरान बीएमसी के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन विभाग ने पदाधिकारियों और अधिकारियों के लिए 13 लग्जरी वाहन खरीदे थे। इनमें महापौर ऋतु तावड़े के लिए 30 से 35 लाख रुपये की 'इनोवा हाइक्रॉस हाइब्रिड' और अन्य 12 पदाधिकारियों (उप महापौर, सदन के नेता, विपक्ष के नेता और वैधानिक समितियों के अध्यक्षों) के लिए 18-18 लाख रुपये की स्कॉर्पियो एन कारें शामिल थीं।

हालांकि, अब सदन के नेता गणेश खंकर समेत अन्य नेताओं ने शिकायत दर्ज कराई है कि उपलब्ध कराई गई स्कॉर्पियो कारें यात्रा के लिए सुविधाजनक नहीं हैं, जिसके बाद अब इनोवा क्रिस्टा कारों की मांग तेज हो गई है।

पूर्व महापौर किशोरी पेडनेकर का तीखा हमला

बीएमसी की इस फिजूलखर्ची पर मुंबई की पूर्व महापौर किशोरी पेडनेकर ने कड़ा एतराज जताते हुए इसे जनता के पैसे की खुली लूट करार दिया है। पेडनेकर ने सवाल उठाया, "स्कॉर्पियो जैसी आधुनिक कार से कमर में दर्द होने का बहाना बनाकर बाजार को बदनाम किया जा रहा है। महज छह महीने में गाड़ियां बदलना क्या जनता के पैसों का सही इस्तेमाल है?"

उन्होंने बीएमसी आयुक्त और प्रशासनिक रवैये पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि महापौर और पदाधिकारियों के निजी सहायकों को भारी-भरकम वेतन और मानदेय दिया जा रहा है, जबकि आम पार्षदों और जनता के हितों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

जनता के पैसों की बर्बादी पर उठ रहे गंभीर सवाल

पिछले चार-पांच वर्षों तक प्रशासक के कार्यकाल के बाद चुनाव संपन्न होने पर प्रतिनिधियों को ये वाहन दिए गए थे। लेकिन महज आधा साल बीतने से पहले ही कारों के कम्फर्ट (आराम) के नाम पर करोड़ों रुपये का नया बजट बनाना मुंबई के नागरिकों के बीच चर्चा और आक्रोश का विषय बन गया है। राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में सवाल उठाए जा रहे हैं कि बुनियादी नागरिक सुविधाओं की कमी झेल रही मुंबई में प्रशासनिक फिजूलखर्ची पर लगाम कब लगेगी।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com