

Mumbai Slum Demolition: मुंबई के स्लम इलाकों में 14 फीट से अधिक ऊंचाई वाले अनधिकृत निर्माणों और झोपड़ों को गिराने के बीएमसी के फैसले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। इस तोड़क कार्रवाई पर जब बीएमसी की महापौर रितू तावड़े से सवाल किया गया, तो उन्होंने पूरी तरह अनभिज्ञता जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है और रिपोर्ट मिलने के बाद ही वह कुछ कह सकेंगी।
दूसरी ओर, बीएमसी सदन के नेता और भाजपा नगरसेवक गणेश खणकर ने पहले ही कमिश्नर अश्विनी भिड़े को पत्र लिखकर इस एकतरफा फैसले का कड़ा विरोध किया था। ऐसे में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि जब पार्टी के अन्य नेताओं को इस फैसले की जानकारी है, तो शहर की प्रथम नागरिक महापौर इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील खबर से कैसे पूरी तरह बेखबर हैं? इसे लेकर प्रशासनिक समन्वय पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विपक्ष ने इस स्थिति को बेहद शर्मनाक करार देते हुए बीएमसी प्रशासन और सत्ता पक्ष पर निशाना साधा है। कांग्रेस के बीएमसी गुट नेता अशरफ आजमी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह घटना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बीएमसी आयुक्त और महापौर के बीच तालमेल और संवाद की भारी कमी है।
भाजपा व शिंदे सेना के संयुक्त बीएमसी चुनावी घोषणापत्र में पांच वर्षों में मुंबई शहर को झोपड़पट्टी-मुक्त बनाने और 40 लाख किफायती घर उपलब्ध कराने का वादा किया गया था। बीजेपी के नगरसेवक मकरंद नार्वेकर ने भी आयुक्त अश्विनी भिड़े को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि मुंबई में पैदल आवागमन को बेहतर बनाने के लिए लागू की जा रही 'पेडेस्ट्रियन फर्स्ट' नीति के तहत फुटपाथों से अवैध अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान निर्वाचित प्रतिनिधियों से परामर्श नहीं किया गया।
गौरतलब है कि बीएमसी ने इससे पहले 19 सितंबर को मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों में अनधिकृत आवासीय संरचनाओं के खिलाफ तीन महीने का विशेष अभियान चलाने की घोषणा की थी।
जिसकी शुरुआत 1 अक्टूबर से होनी तय की गई थी। बीएमसी के आंकड़ों के मुताबिक, शहर में कुल 39,111 ऐसी संरचनाओं की पहचान की गई है, जिन्हें तोड़ा जाना है।
मुंबई मनपा प्रशासन ने यह सख्त कदम अगस्त में कुर्ला की पहाड़ी के पास स्थित अनधिकृत बस्ती में हुए भूस्खलन के बाद उठाया था, जिसमें आठ लोगों की मौत हो गई थी।
इसके अलावा, एक महीने पहले मानखुर्द में भारी बारिश के दौरान एक मकान ढहने से छह मासूम बच्चों की जान चली गई थी। इन दोनों ही दुर्घटनाओं में मृतक अवैध और असुरक्षित संरचनाओं में रह रहे थे, जिसके बाद प्रशासन ने यह कार्रवाई तेज करने का निर्णय लिया है।
बुधवार को आयोजित स्थायी समिति की बैठक में विभिन्न दलों के नगरसेवकों ने इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया, जनप्रतिनिधियों ने एक सुर में कहा कि प्रशासन ने 14 फीट या उससे अधिक ऊंचाई वाली अवैध संरचनाओं को तोड़ने का अभियान शुरू करने से पहले उन्हें विश्वास में नहीं लिया, सदस्यों ने इस योजना का तुरंत विरोध करते हुए प्रशासन से प्रस्ताव वापस लेने की मांग की
इन ऊंची झुग्गियो में रहने वाले अधिकांश लोग वंचित तबके से है और कई परिवार दशकों से यहां रह रहे हैं। आखिर इन संरचनाओं के चयन का आधार क्या है? गरीबों के सिर से अचानक छत छीनना उनके साथ सरासर अन्याय होगा।
यशोधर फणसे, शिवसेना (यूबीटी)
इतने संवेदनशील प्रस्ताव को सामने रखने से पहले राजनीतिक दलों के गुट नेताओं से चर्चा होनी चाहिए थी। जनप्रतिनिधियों को इसकी जानकारी मीडिया के जरिए मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। ऐसे फैसलों में सभी पक्षों की भागीदारी जरूरी है।
अशरफ आजमी, कांग्रेस गुट नेता