बाबा आमटे को मिला था UN का मानवाधिकार पुरस्कार, अब बेटे डॉ. विकास आमटे को अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का न्योता

Vikas Amte International Recognition: बाबा आमटे को 1988 में मिला था UN का मानवाधिकार पुरस्कार। अब बेटे डॉ. विकास आमटे को ACHRS ने Laureates' Network से जुड़ने का निमंत्रण दिया है।
Baba Amte and his son Dr. Vikas Amte The legacy of social service at Anandwan
बाबा आमटे और डॉ. विकास आमटे(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Highlights

  • फडणवीस ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर डॉ. विकास आमटे को बधाई दी।

  • बाबा आमटे को मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए प्रतिष्ठित सम्मान मिला था।

  • परिवार को अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ने का निमंत्रण मिलना गर्व की बात है।

Vikas Amte Gets International Invitation: महाराष्ट्र के आनंदवन में कभी समाज से दूर कर दिए गए कुष्ठरोगियों को सम्मान के साथ जीने का रास्ता दिखाने वाले बाबा आमटे की विरासत आज भी आगे बढ़ रही है। अब उनके बेटे डॉ. विकास आमटे को एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय निमंत्रण मिला है, जिसने एक बार फिर आनंदवन को चर्चा में ला दिया है।

जॉर्डन के Amman Center for Human Rights Studies (ACHRS) ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार विजेताओं के प्रतिष्ठित नेटवर्क से जुड़ने के लिए आमंत्रित किया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी इस खबर पर खुशी जताते हुए इसे महाराष्ट्र और आनंदवन के लिए गर्व का क्षण बताया है।

आमटे परिवार की सामाजिक सेवा की विरासत

फडणवीस ने 7 नवंबर को सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा कर डॉ. विकास आमटे और आनंदवन परिवार को बधाई दी। इस मौके पर उन्होंने बाबा आमटे के 1988 में मिले संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार का भी जिक्र किया।

दरअसल, बाबा आमटे को मानवाधिकारों के संरक्षण और समाज के वंचित तबकों के लिए किए गए काम के लिए यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला था। अब उनके बेटे को उसी पुरस्कार के विजेताओं के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ने का निमंत्रण मिलना परिवार की सामाजिक सेवा की विरासत को फिर सुर्खियों में ले आया है।

बाबा आमटे को मिला था UN का मानवाधिकार पुरस्कार

बाबा आमटे का जीवन समाज के उन लोगों के लिए समर्पित रहा, जिन्हें बीमारी के कारण भेदभाव और सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ता था। उन्होंने कुष्ठरोगियों को केवल इलाज देने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और समाज में सम्मान के साथ जीने का अवसर देने के लिए काम किया।

इसी योगदान के लिए वर्ष 1988 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र का Human Rights Prize प्रदान किया गया था। यह सम्मान मानवाधिकारों के संरक्षण और प्रोत्साहन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वालों को दिया जाता है।

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1949 में रखी गई थी आनंदवन की नींव

बाबा आमटे ने वर्ष 1949 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के वरोरा के पास आनंदवन की शुरुआत की थी। उस समय कुष्ठरोगियों को समाज से अलग-थलग कर दिया जाता था। ऐसे लोगों को सहारा देने के बजाय उनसे दूरी बनाई जाती थी। बाबा आमटे ने इसी सोच को बदलने का बीड़ा उठाया। उन्होंने आनंदवन को ऐसा केंद्र बनाया, जहां कुष्ठरोग से प्रभावित लोग इलाज के साथ खेती, छोटे उद्योगों और दूसरे कामों के जरिए आत्मनिर्भर बन सकें।

समय के साथ आनंदवन का काम भी बढ़ता गया। यहां स्वास्थ्य सेवाओं, दिव्यांगों के पुनर्वास, शिक्षा और सामाजिक विकास से जुड़ी गतिविधियां शुरू हुईं। इस तरह आनंदवन केवल एक सेवा संस्थान नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गया।

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पिता के काम को आगे बढ़ा रहे हैं डॉ. विकास आमटे

बाबा आमटे के बाद उनके परिवार ने आनंदवन की जिम्मेदारी संभाली। डॉ. विकास आमटे महारोगी सेवा समिति के सचिव के रूप में इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके साथ आनंदवन परिवार की पूरी टीम सामाजिक सेवा और पुनर्वास से जुड़े कार्यों में जुटी है।

डॉ. विकास आमटे को मिला यह निमंत्रण इसी विरासत की अंतरराष्ट्रीय पहचान से जुड़ा है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि उन्हें नया संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार नहीं दिया गया है, बल्कि ACHRS ने उन्हें पूर्व पुरस्कार विजेताओं के Laureates' Network से जुड़ने के लिए आमंत्रित किया है।