आगे कुआं तो पीछे खाई…मराठा आंदोलन से मुश्किल में फडणवीस, सरकार पर मंडरा रहा है खतरा!
Manoj Jarange Patil Maratha Reservation: महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय के चुनावों से पहले मराठा आरक्षण आंदोलन को तेज करके मुंबई में जमे मनोज जरांगे पाटिल पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
- Written By: अर्पित शुक्ला
CM फडणवीस, मनोज जरांगे
Maratha Protest: मराठा आरक्षण के मसले पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अब एक कठिन मोड़ पर आ खड़े हुए हैं। एक ओर मनोज जरांगे पाटिल आज़ाद मैदान छोड़ने को राज़ी नहीं हैं, तो वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट ने मराठा आंदोलनकारियों को मंगलवार शाम 4 बजे तक मुंबई की सड़कों से हटने का निर्देश जारी किया है। यदि अदालत के आदेश का पालन कराने के लिए बल का प्रयोग किया गया तो हालात बिगड़ सकते हैं। ऐसे में दोबारा बहुमत के साथ सत्ता में लौटे सीएम फडणवीस पर सबकी निगाहें हैं कि वे मराठा आरक्षण, कोर्ट के निर्देश और ओबीसी वर्ग को नाराज़ किए बिना कैसे रास्ता निकालते हैं। गौरतलब है कि पिछली बार मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने जरांगे को नवी मुंबई से ही लौटा दिया था, जिससे मुंबई बड़े जाम से बच गई थी।
आगे कुआं पीछे खाई वाली स्थिति
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि फडणवीस के राजनीतिक करियर की सबसे गंभीर चुनौती इस वक्त सामने है। मुंबई की सड़कों पर हजारों मराठा प्रदर्शनकारी मौजूद हैं। ऐसे में सरकार को सोच-समझकर निर्णय लेना होगा। जरांगे की मांग है कि मराठा समुदाय को ओबीसी के अंतर्गत कुनबी श्रेणी में आरक्षण दिया जाए। लेकिन ऐसा हुआ तो ओबीसी समुदाय की नाराज़गी एक नई समस्या बन सकती है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में राजनीतिक जानकारों ने हैरानी जताई कि जरांगे को आज़ाद मैदान आने की अनुमति देना “आ बैल मुझे मार” जैसी स्थिति बन गई है। जरांगे जिस प्रकार अडिग हैं, उससे यह संभावना बेहद कम है कि वे केवल आश्वासन पर जालना लौट जाएंगे। ध्यान रहे कि गृह विभाग भी फडणवीस के पास ही है।
फडणवीस का ‘बिग टेस्ट’
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर आंदोलन में कोई भी अप्रिय घटना घटी, तो सरकार पर उसका सीधा असर पड़ सकता है। हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू में फडणवीस ने कहा था कि महाराष्ट्र की राजनीति में उनका मुख्यमंत्री होना कुछ लोगों को नहीं सुहाता, लेकिन 2014 में भाजपा ने उन्हें जिम्मेदारी दी थी। फडणवीस ब्राह्मण हैं, जबकि उपमुख्यमंत्री शिंदे और अजित पवार मराठा समुदाय से हैं। ऐसे में मराठा आंदोलन को संभालना उनके लिए एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा है। जरांगे के आज़ाद मैदान में टिक जाने से यह चुनौती और गंभीर हो गई है। क्योंकि सभी मराठाओं को कुनबी वर्ग में डालना कानूनी रूप से आसान नहीं है। किसी जाति की पहचान और वर्गीकरण भारत सरकार की अधिसूचना और संसद द्वारा ही होता है। राज्य सरकार अपनी मर्जी से किसी समुदाय को दूसरी जाति में नहीं डाल सकती।
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जरांगे को कैसे मनाएगी सरकार?
मराठा आंदोलन का नेतृत्व कर रहे मनोज जरांगे लगातार फडणवीस पर निशाना साध रहे हैं। वे उनकी तुलना गिरगिट से कर चुके हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर मराठा समुदाय की मांग मानी गई तो धनगर समाज भी आरक्षण के लिए फिर से सड़क पर उतर सकता है। सरकार यह सिफारिश कर सकती है कि मराठा और कुनबी समुदाय समान हैं, और मराठों को ओबीसी सूची में जोड़ा जाए। इसके बदले सरकार जरांगे से कुछ समय की मोहलत मांग सकती है। लेकिन सवाल ये है कि क्या जरांगे इतने पर मान जाएंगे?
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राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सरकार को जो भी निर्णय लेना है, वह न्याय की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। वरना यह फैसला अदालत में चुनौती का कारण बन सकता है। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद संभावना है कि सरकार जरांगे से अपील करे कि वे अपने समर्थकों को शांतिपूर्ण तरीके से लौटने का अनुरोध करें।
