

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जालना में स्थानीय निकाय चुनाव की चर्चाएं तेज।
करीब 6 साल से जिला परिषद चुनाव का इंतजार कर रहे दावेदार सक्रिय।
भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन को लेकर असमंजस बरकरार।
महाविकास आघाड़ी के सामने सीट बंटवारे की चुनौती।
कई नेताओं और उनके परिजनों के जिला परिषद चुनाव लड़ने की चर्चाएं।
Jalna Zilla Parishad Election BJP Shiv Sena Alliance: सुप्रीम कोर्ट से जुड़े फैसले के बाद जालना जिले में जिला परिषद और पंचायत समिति चुनाव की तैयारियां तेज हो गई हैं। भाजपा-शिवसेना गठबंधन और महाविकास आघाड़ी के सीट बंटवारे को लेकर चर्चाएं शुरू हैं। कई स्थानीय नेताओं के नाम संभावित उम्मीदवारों के रूप में सामने आ रहे हैं।
जालना, स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट से जुड़े फैसले के बाद जिले में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। करीब 6 वर्षों से जिला परिषद और पंचायत समिति चुनाव का इंतजार कर रहे इच्छुक प्रत्याशियों ने एक बार फिर तैयारियां शुरू कर दी हैं। हालांकि अभी चुनाव की तारीख घोषित नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों में उम्मीदवारों की तलाश और संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल भाजपा और शिवसेना के संभावित गठबंधन को लेकर है। राज्य और केंद्र में दोनों दल सत्ता में साथ हैं, लेकिन महानगरपालिका चुनाव के दौरान दोनों के बीच गठबंधन की चर्चा अंतिम समय तक चलने के बावजूद सहमति नहीं बन पाई थी। अब देखना होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों के चुनाव में भाजपा शिवसेना को साथ लेती है या अलग-अलग चुनाव लड़ने का विकल्प चुनती है।
जालना के ग्रामीण क्षेत्रों में शिवसेना की प्रभावी मौजूदगी के कारण सीटों के बंटवारे में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि दोनों दलों के बीच समझौता नहीं होता है, तो अलग-अलग चुनाव लड़ने और नतीजों के बाद सत्ता के लिए साथ आने का विकल्प भी खुला रह सकता है।
दूसरी ओर, महाविकास आघाड़ी के घटक दलों के सामने भी सीटों का बंटवारा बड़ी चुनौती रहेगा। कांग्रेस और शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सहित अन्य सहयोगी दल अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत के अनुसार चुनावी तैयारी में जुटे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में जिला परिषद को मिनी मंत्रालय के रूप में जाना जाता है। पिछले करीब छह वर्षों से यहां चुनाव नहीं होने के कारण कामकाज प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में है। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में स्थानीय विकास कार्यों की प्राथमिकताएं तय करने में जनता की सीधी भागीदारी सीमित हुई है।
15वें वित्त आयोग के तहत विकास निधि सीधे संबंधित संस्थाओं के खातों में पहुंचती है, लेकिन स्थानीय जरूरतों और विकास कार्यों की प्राथमिकता तय करने में निर्वाचित सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।
संभावित उम्मीदवारों को लेकर जिले में कई नामों की चर्चा है। विधायक अर्जुन खोतकर के बेटे अभिमन्यु और विधायक बबनराव लोणीकर के बेटे राहुल के दोबारा जिला परिषद चुनाव लड़ने की अटकलें हैं।
इसके अलावा शिवसेना जिला प्रमुख भाऊसाहेब पुगें, शहर प्रमुख विष्णु पाचफुले, भाजपा के शालिग्राम महरके, राकांपा (शरद पवार) के सतीश टीपे, कांग्रेस के सुरेश कलंबे, एड. संजय कालबांडे, बद्रीनाथ पठाडे और महेंद्र पवार के नाम भी संभावित दावेदारों में लिए जा रहे हैं।
पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष कीर्ति उढाण, पूर्व सदस्य जयमंगल जाधव, भोकरदन के मनीष श्रीवास्तव, पूर्व सभापति रमेश गव्हाड, बलीराजा संगठन के नारायण लोखंडे, पूर्व विधायक नारायण चव्हाण के बेटे जयप्रकाश चव्हाण, आंबेडकर आंदोलन से जुड़े सुधाकर निकाले, एड. शिवाजीराज आदमाने, एड. ब्रह्मानंद चव्हाण, कांग्रेस जिलाध्यक्ष कल्याण दले और राम सावंत के नाम भी चर्चा में हैं।
आगामी दो महीनों में चुनाव होने की संभावना को देखते हुए राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। वहीं, मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और जनगणना संबंधी कार्यों में बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी लगे हुए हैं। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया के लिए पर्याप्त कर्मचारियों की व्यवस्था करना प्रशासन के सामने चुनौती बन सकता है।