प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Jalgaon Cold Chain Logistics: जलगांव देश में केला उत्पादन में उसाणी माने जाने वाला जलगांव जिला आज एक अजीब विरोधाभास से जूझ रहा है। गुणवत्ता के मामले में यहां का केला अंतरराष्ट्रीय नां को चुनौती देता है और उत्पादन भी सालभर होता है, लेकिन बाजार की सीमाओं में फंसा है।
रूस और खाड़ी देशों में निर्यात बेहद कम है, जबकि स्थानीय मंडियों में कीमतों का उतार-चढ़ाव किसानों की कमर तोड़ रहा है। इस योजना के माध्यम से जलगांव के केले को ग्लोबल ब्रांड बनाने की तैयारी थी।
योजना में 50 पैक हाउस, 10 राइपनिंग चेंबर और 23 प्रोसेसिंग यूनिट्स बनाने का प्रस्ताव है। मजबूत कोल्ड चेन और भुसावल से मुंबई के जेएनपीटी बंदरगाह तक सीधी रेल कनेक्टिविटी का सपना दिखाया गया है। राष्ट्रीय फलोत्पादन मंडल ने एक यूनिट के लिए अधिकतम 100 करोड़ रुपये तक अनुदान देने का प्रावधान रखा है।
सरकारी नियमों के अनुसार, योजना का लाभ लेने के लिए संबंधित संस्था था किसान उत्पादक कंपनी को कम से कम 300 करोड़ रुपये का स्वयं निवेश करना होगा, यानी 40 प्रतिशत सब्सिडी तभी मिलेगी जब संस्था पहले 300 करोड़ की भारी-भरकम पूंजी जुटा ले।
यही कारण है कि जहां सैकड़ों प्रस्ताव आने की उम्मीद थी, वहां अब तक केवल चार से पांच प्रस्ताव ही सामने आए है। किसानों का पूंजी जुटाना कहना है कि इतनी बड़ी उनकी क्षमता से बाहर है, जिससे निर्यात का सपना अधर में लटक गया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय राज्यमंत्री रक्षा खडसे ने हस्तक्षेप किया है। उन्होंने केंद्र सरकार से इन कड़ी शर्तों में बील देने की मांग की है। रक्षा खडसे का तर्क है कि यदि निवेश की अनिवार्यता कम की जाए, तो जलगांव का केला वैश्विक बाजार में सही मायनों में अपनी पहचान बना सकेगा और छोटे किसान भी इस क्लस्टर का हिस्सा बन पाएंगे।
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फिलहाल, जिले के हजारी केला उत्पादकों की निगाहे केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी है। यदि शर्त नहीं हटाई गई, तो जलगांव को स्केला किंगर होने के बावजूद बड़े ग्राहकों के लिए घरेलू मंडियों पर ही
निर्भर रहना होगा।
प्रस्तावित यूनिटः 23 प्रोसेसिंग और 50 पैक हाउस। मुख्य बाचा 300 करोड़ रुपये के स्वयं निवेश की शर्त। अनुदान की सीमा अधिकतम 100 करोड़ रुपये, लक्ष्यः जेएनपीटी बंदरगाह के जरिए सीधा वैश्विक निर्यात।