गोंदिया में कागजों पर चल रहीं ग्राम सतर्कता समितियां; पदाधिकारियों को अपने पद और अधिकारों का पता ही नहीं

Tiroda Gram Panchayat: तिरोड़ा में ग्राम स्तर की सतर्कता समितियों के गठन पर सवाल उठे हैं। कई समितियां केवल कागजों पर होने और पदाधिकारियों को अधिकारों की जानकारी न होने के आरोप लगे हैं।
Gondia-Tiroda Gram Vigilance Committee News
ग्राम पंचायत प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स - सोशल मीडिया)
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Gondia-Tiroda Gram Vigilance Committee News: शासन ने तिरोड़ा गांव के सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए कई महत्वाकांक्षी विकास योजनाएं बनाई हैं। इन योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन और पारदर्शिता के लिए ग्राम स्तर पर नागरिकों की 'सतर्कता समितियों' का भी गठन किया गया था। लेकिन इन समितियों के पदाधिकारियों को अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी न होने के कारण गोंदिया जिले की अधिकांश ग्राम पंचायतें शासन की इन कल्याणकारी योजनाओं का बोझ झेल रही हैं।

विशेष बात यह है कि कई गांवों में ये समितियां केवल कागजों पर ही स्थापित की गई हैं और उक्त समिति में शामिल कई लोगों को तो यह पता ही नहीं है कि वे इसके सदस्य या पदाधिकारी हैं।

1973 के 73वें संवैधानिक संशोधन ने ग्राम पंचायतों को स्वायत्तता प्रदान की थी, जिसके तहत जनभागीदारी से विकास योजनाओं को क्रियान्वित करने की रणनीति बनाई गई। इनमें राष्ट्रीय पेयजल योजना, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि, पर्यावरण संतुलित ग्राम, गाडगे महाराज ग्राम स्वच्छता मिशन, ग्रामीण जल आपूर्ति व स्वच्छता समिति, ग्राम स्वास्थ्य पोषण व जल आपूर्ति स्वच्छता समिति सहित वन विभाग की संयुक्त वन व्यवस्थापन समिति शामिल है।

अधिकारों की जानकारी नहीं

इसके अलावा, गृह मंत्रालय के अधीन महात्मा गांधी विवाद मुक्त ग्राम समिति, लोक आपूर्ति विभाग की सतर्कता समिति, सामाजिक लेखा परीक्षा (सोशल ऑडिट) समिति, कृषि विभाग की जैव विविधता समिति और ग्राम कृषि विकास समिति तथा बाल संरक्षण विभाग की ग्राम बाल संरक्षण समिति जैसी विभिन्न विषय समितियों के गठन का अधिकार दिया गया।

पंचायती राज अभियान के तहत इन समितियों की संकल्पना को इसलिए साकार किया गया था ताकि शासकीय निधि से होने वाले हर काम पर जनता का सीधा नियंत्रण हो सके।

लेकिन समय के साथ इन समितियों के गठन में स्थानीय राजनीति ने प्रवेश कर लिया और इन समितियों का पतन होने लगा। परिणामस्वरूप, सरपंच व अन्य मुख्य पदाधिकारियों ने निष्पक्ष लोगों के बजाय अपनी करीबी मंडलियों को खुश करने के लिए उन्हें इन कमेटियों में जगह देनी शुरू कर दी, जिन्हें स्वयं के अधिकारों की कोई तकनीकी जानकारी नहीं थी।

इसके चलते गांवों के सरपंच, ग्राम सेवक व अन्य विभागों के अधिकारी व कर्मचारी कई योजनाओं में वित्तीय अनाचार (भ्रष्टाचार) में लिप्त रहे हैं। अतः अब विशेषज्ञ नागरिकों द्वारा यह राय व्यक्त की जा रही है कि ग्रामीणों में ग्राम सतर्कता के अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।

नियमों की अवहेलना

मुंबई ग्राम पंचायत अधिनियम 1958 के प्रावधानों के अनुसार, सरकारी योजनाओं की निगरानी के लिए तैयार की जाने वाली सतर्कता समिति को सीधे 'ग्राम सभा' के माध्यम से गठित करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया था। लेकिन कई ग्राम पंचायतों में सरपंच व ग्राम सेवक नियमों को ताक पर रखकर केवल अपनी राजनीतिक एहसानमंदी निभा रहे हैं।

इसे लेकर सजग नागरिकों और पदाधिकारियों के बीच भारी मनमुटाव बना हुआ है और ऐसा प्रतीत होता है कि कई गांवों में नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

समितियों का कोई फायदा नहीं है

आजकल गांवों में सीमेंट की सड़कें बनाना, नालियां बनवाना और जलापूर्ति के तमाम निर्माण कार्य सतर्कता समिति को पूरी तरह अंधेरे में रखकर किए जाते हैं। जहां कहीं सतर्कता समिति के पदाधिकारी जागृत होकर आवाज उठाते हैं, वहां वित्तीय लेन-देन के जरिए उनका मुंह बंद करने का प्रबंध कर दिया जाता है।

इसलिए धरातल पर यह देखने में आ रहा है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी ग्राम सतर्कता समितियों से आम जनता को कोई लाभ नहीं मिल रहा है।

ग्राम पंचायत अंतर्गत राशन आवंटन में भी अनदेखी

आम नागरिकों को सस्ती दरों पर आवश्यक खाद्य वस्तुएं उपलब्ध हों, इसके लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत के अंतर्गत संचालित उचित दर (सस्ते अनाज) की दुकानों पर भी एक सतर्कता समिति का गठन किया जाता है। हालांकि, यहां भी यह देखा जा रहा है कि अध्यक्ष सहित इस समिति के सदस्यों का ग्रामीणों के हितों से कोई सरोकार नहीं रह गया है। सतर्कता समिति द्वारा कालाबाजारी या अनियमितताओं पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता; इसलिए ये राशन सतर्कता समितियां भी केवल एक दिखावा बनकर रह गई हैं।

क्रियान्वयन व समन्वय नहीं

अध्यक्ष (विविध कार्यकारी सेवा सहकारी संस्था, कवलेवाडा) कंठीलाल ठाकरे "राशन दुकानों में होने वाली अनियमितताओं को रोककर व्यवस्था में सुधार लाने व ग्राम स्तर पर उचित देखरेख के लिए ये समितियां बनाई गई हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इनका सही क्रियान्वयन और विभागों के बीच आपसी समन्वय नहीं होने के कारण आम जनता की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।"

सदस्यों को करें सक्रिय

नागरिक (भिवापुर) कान्हू मेश्राम "सरकार द्वारा गांवों में विभिन्न विकास कार्यों को सुचारु रूप से संपन्न कराने के लिए गांव के ही नागरिकों की समितियां तो बना दी गईं, लेकिन समिति के इन सदस्यों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक और सक्रिय करने की जिम्मेदारी निभाने में सरकार बेहद सुस्त नजर आ रही है। इस व्यवस्था को तुरंत सुधारा जाना चाहिए।"

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