गोंदिया की कचारगढ़ गुफा में बसती है गोंडवाना की विरासत, हर साल जुटते हैं लाखों श्रद्धालु
Kachargarh Cave: गोंदिया जिले की कचारगढ़ गुफा केवल एक प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि गोंड आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति और इतिहास का प्रमुख केंद्र है, जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
- Written By: केतकी मोडक
फाईल फोटो (सोर्स - सोशल मिडिया)
The Heritage Of Gondwana Resides In The Kachargarh Cave Of Gondia: गोंदिया जिले के सालेकसा तहसील अंतर्गत मुंबई-हावड़ा मार्ग पर स्थित दरेकसा रेल्वे स्टेशन से 3 किमी। दूर धनेगांव के घने जंगल में स्थित ये गुफाएं, पहाड़ों की हरियाली और प्राकृतिक खूबसूरती के बीच स्थित है कचारगढ़ गुफा। यह एशिया खंड के सबसे महाकाय प्राचीन प्राकृतिक गुफा है। इस गुफा को आदिवासी गोंड समुदाय का उद्गम स्थल कहा जाता है लेकिन यह जगह आज भी गुमनामी में है।
प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के दिन से आदिवासी समुदाय के आराध्य देवता महागोगोना कोयापूनम महापूजा का आयोजन किया जाता है। जहां देश के विभिन्न राज्यों के आदिवासी समाज एकत्रित होकर इस पांच दिवसीय राष्ट्रीय गोंडवाना महाअधिवेशन महोत्सव यात्रा में एकत्रित होकर इस श्रद्धा स्थल पर पहुंते हैं। गोंड़ी धर्म परंपरा, बोली भाषा, पूजाविधि, नृत्यकला, रीति रिवाजों व आदिवासी कला सांस्कृतिक महोत्सव देखने को मिलते हैं। कचारगढ़ गुफा में आदिवासी गोंड समाज के कुलदेवता का निवास है।
प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को देशभर में फैले आदिवासी समाज अपने पूर्वजों को याद करने व गोंड़ी रचनाकार पारी कुपार लिंगो को याद करते हैं। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश की सीमा पर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में कचारगढ़ गुफा है जो एशिया की सबसे बड़ी प्राकृतिक गुफा के नाम से प्रसिद्ध है। यह गुफा लगभग 518 मीटर ऊंचाई पर स्थित है, गुफा की ऊंचाई 94 मीटर व 25 मीटर गुफा का द्वार है। लेकिन यह गुफा अतिसंवेदनशील क्षेत्र में होने से जितना विकास होना चाहिए था उतना विकास नहीं हो पा रहा है।
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पावन भूमि पर 1984 में लगा था पहली बार मेला
आदिवासी समाज की पवित्र भूमि के रूप में प्रसिद्ध कचारगढ़ की खोज संबंधी रोम हर्षक इतिहास का कथन करने वाली किताब में सिद्ध किया है। उल्लेखनीय है कि सन 1980 में के।बी मरसकोल्हे, आचार्य मोतीरावन कंगाली, सुमेद्रसिंह ताराम, भरतलाल कोराम व शीतल मरकाम ने अपनी युवावस्था में धनेगांव आकर कचारगढ़ की खोज की थी।
जिसकी पहली यात्रा 1984 में शुरू हुई थी जो आज लाखो श्रद्धालू तक पहुंच गई है। कचारगढ़ की इस यात्रा में देश के केंद्रीय व राज्य मंत्रियों के अलावा सांसद, विधायक व शासन के विभिन्न विभागों के अधिकारी, सचिव, आयुक्त आते रहते हैं।
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इन राज्यों से पहुंचते हैं हर साल लाखों श्रद्धालु
आदिवासी समाज के पवित्र भूमी कचारगढ़ के राष्ट्रीय गोंडवाना महाअधिवेशन में आदिवासी गोंड समाज अपने धर्म गुरु के दर्शन करने महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिसा, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, गोवा से बड़े पैमाने में जय सेवा के जयकारे के साथ पहुंचते हैं।
