गोंदिया में खेती के लिए नहीं मिल रहे मजदूर, ठेके पर खेती करवाने का बढ़ा चलन
Agriculture Labor: गोंदिया जिले में सरकारी मुफ्त खाद्यान्न वितरण और लाडली बहन जैसी योजनाओं के चलते कृषि कार्यों के लिए मजदूरों का भारी अकाल पड़ गया है, जिससे अब ठेका खेती का चलन बढ़ रहा है।
- Written By: केतकी मोडक
गोंदिया कृषि श्रमिक (सोर्स फोटो - नवभारत)
Gondia Agriculture Labor Shortage: राज्य और केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से नागरिकों को मुफ्त खाद्यान्न वितरित किया जाता है। इस अनाज वितरण के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के लिए मजदूर मिलना मुश्किल हो गया है और कई जगहों पर खरीफ मौसम की खेती पर भी इसका असर पड़ा है। जिससे किसान खेती काम के लिए मजदूरों की तलाश में है।
राज्य और केंद्र सरकार ने रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से 100 दिन का रोजगार देने की योजना शुरू की है। गरीबी रेखा से नीचे के नागरिकों के साथ-साथ अन्य वर्ग के नागरिकों के लिए निःशुल्क अनाज वितरण योजना प्रारंभ की गई।
अनाज का वितरण सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से 2 से 5 रुपये प्रति किलो के हिसाब से भी किया जाता है। पहले खेती के लिए गांव में ही मजदूर मिलते थे। लेकिन अब मजदूर अतिरिक्त पैसा देने के बाद भी कृषि कार्य के लिए आने को तैयार नहीं हैं। इससे किसानों की समस्या बढ़ती जा रही है। रोजगार गारंटी योजना के तहत रोजगार के लिए पंजीकरण कराने वालों को सरकार मजदूरी दे रही है।
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इससे ऐसी स्थिति बन जाती है कि कृषि कार्य के लिए महिला व पुरुष मजदूर उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। जिले में सिंचाई सुविधाओं के अभाव में अधिकांश क्षेत्रों में एकही बार फसल ली जाती है। कई समृद्ध किसान खेती करने के लिए मजदूरों पर निर्भर हैं। लेकिन अब खेती के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं।
जिससे कई किसानों को ट्रैक्टर से खेती का काम करना पड़ता है। कही-कही पुरुष मजदूरों को 300 से 400 रुपये प्रतिदिन देना पड़ता है। उसके बाद भी मजदूर नही मिल रहे है। गर्मी के दिनों में केवल सुबह 9 बजे से 11 बजे तक और शाम 4 बजे से शाम 6 बजे तक ही कृषि कार्य किए जाते है। लेकिन इस काम के लिए किसानों को मजदूर मिलना मुश्किल हो गए है।
पशुपालन पर भी असर
खेती के मौसम में कुछ किसानों को काम के लिए ट्रैक्टर से गांव से मजदूरों को लाना पड़ता है। इसके चलते दूर-दराज के इलाकों और शहरों में रहने वाले कई किसान जो गांवों में खेती कर रहे हैं, उन्हें अपनी कृषि भूमि को ठेके में देना पड़ रहा है। कुछ किसान साझेदारी में खेती कर रहे हैं तो कुछ किसान नकद पैसा लेकर एक सीजन के लिए अपनी खेती दे रहे है।
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पहले मजदूर उपलब्ध होने के कारण किसान पशुपालन करते थे, लेकिन अब पशुओं की देखभाल के लिए कोई तैयार नहीं है। इससे पशुपालन का कारोबार भी चौपट हो गया है।
खेती करना बस की बात नहीं
पांढराबोडी किसान ईशुलाल चव्हाण ने कहा है कि “लोगों निःशुल्क अनाज का वितरण होने से गांव में मजदूर नहीं मिल रहे है, वहीं लाडली बहन योजना की लाभार्थी महिलाओं को लाभ प्राप्त होने से वे भी कृषि कार्य के लिए आने को तैयार नहीं है। इससे किसानों की समस्या बढ़ती जा रही है और खेत के कार्य प्रभावित हो जाते है। इसी समस्या को लेकर अब खेती करना बस की बात नही रही, जिसके कारण खेती के काम ठेके पर देना पड़ रहा है।”
