आदिवासी बहुल घोटसुर विकास की प्रतीक्षा में, जनप्रतिनिधियों में उदासीनता के चलते नहीं बन सकी सड़क
- Written By: नवभारत डेस्क
एटापल्ली. जिले के आखिरी छोर तथा महाराष्ट्र-छग सीमा पर बसा घोटसूर क्षेत्र आजादी के सात दशक बाद भी उपेक्षित है. इस गांव में वाहन ही नहीं जाने से गांव के लोग पैदल ही सफर तय करते हैं. इसके अलावा गांव में बुनियादी सुविधा नहीं पहुंच पायी है. जिससे इस गांव के नागरिकों को विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
मात्र इस ओर जनप्रतिनिधि और प्रशासन की बेध्यानी होने से नागरिकों नागरिकों में तीव्र नाराजगी व्यक्त की जा रही है. जिला मुख्यालय से 115 और तहसील मुख्यालय से 47 किमी दूरी पर स्थित घोटसूर गांव नक्सल प्रभावित के रूप में पहचाना जाता है. यहां पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने से गांव के नागरिकों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
गांव में जाने के लिये अब तक पक्की सड़क नहीं बन पायी है. जिससे गांव के लोगों को पैदल ही दूसरे गांवों में आना-जाना करना पड़ता है. गांव के लोगों द्वारा कसनसूर-घोटसुर मार्ग पर पक्की सड़क निर्माण करने संदर्भ में अनेक बार जनप्रतिनिधि और प्रशासन का ध्यानाकर्षण कराया गया. बावजूद इसके संबंधितों की उदासीनता के चलते पक्की सड़क नहीं बन पायी है. जिसके चलते इस गांव में वाहन भी नहीं जाती.
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जिससे गांव के लोगों को मजबूरन साइकिल अथवा पैदल ही सफर करना पड़ता है. इस गांव में बिजली तो पहुंची है, किंतु माह में 15 दिनों तक बिजली गुल रहती है. स्वास्थ्य सेवा तो पहुंची किंतु कर्मचारी परिसर के बड़े गांव कसनसूर में रहकर आवागमन करते है. कसनसूर-घोट इस 15 किमी के मार्ग पर दो छोटे नाले हैं. इन नालों पर पुलिया का निर्माण नहीं होने के कारण बरसात के दिनों में घोटसूर समेत परिसर के गुंड़ाम, भुमकाम, गुडराम गांवों संपर्क टूट जाता है. जिससे इस क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की मांग की जा रही है.
